वाराणसी। आरटीओ की अवैध वसूली का खेल इन दिनों रेंज के चार जिलों में सरगर्मी से छाया हुआ है। इसी बीच सामने आया है कि ट्रैफिक पुलिस भी शहर में इंट्री के नाम पर अवैध वसूली करती है और यह खेल विभागीय अधिकारियों की शह पर होता है। डीआईजी रेंज द्वारा कराई गई जांच के बाद कैंट थाने में दो आरोपियों के खिलाफ रंगदारी के आरोप में टीआई जगत कन्नौजिया ने मुकदमा दर्ज कराया है। वहीं, शिकायतकर्ता का आरोप है कि मामले में सिर्फ वसूली एजेंटों के खिलाफ कार्रवाई की गई और ट्रैफिक पुलिस के जिम्मेदार अधिकारियों को बचाने का काम किया गया है।
पूर्वांचल ट्रक ओनर्स एसोसिएशन के उपाध्यक्ष प्रमोद कुमार सिंह ने बीते 21 मार्च को डीआईजी रेंज को प्रार्थना पत्र देकर शिकायत की थी। प्रमोद का आरोप था कि देहात परमिट वाले वाहनों से अवैध तरीके से इंट्री शुल्क वसूल उन्हें शहर में चलने की अनुमति दी जाती है। वसूली करने का काम चोलापुर के कोहासी का करिया सिंह और बड़ागांव के अहरत का सतेंद्र कुमार सिंह करता है। प्रमोद ने अपनी शिकायत के साथ ही दोनों एजेंटों से बातचीत और वसूली के स्टिंग ऑपरेशन की सीडी भी डीआईजी रेंज को सौंपी थी। डीआईजी रेंज ने मामले की जांच तत्कालीन चंदौली एसपी दीपिका तिवारी और एसपी ग्रामीण आशीष तिवारी से कराई। प्रमोद ने बताया कि चंदौली एसपी ने अपनी जांच में शिकायत को सही पाया। उनकी रिपोर्ट के आधार पर करिया सिंह और सतेंद्र सिंह के खिलाफ कैंट थाने में बीते शनिवार को टीआई जगत कन्नौजिया ने रंगदारी के आरोप में मुकदमा दर्ज कराया। प्रमोद सिंह ने आरोप लगाया कि उनकी मांग थी कि अवैध वसूली के इस खेल में शामिल एसपी ट्रैफिक, सीओ ट्रैफिक और ट्रैफिक इंस्पेक्टर के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज किया जाए। मगर, तीनों को बचाते हुए सिर्फ करिया और सत्येंद्र सिंह के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया। इसलिए इस मामले की मुख्यमंत्री से भी शिकायत करेंगे। इस संबंध में एसएसपी नितिन तिवारी ने बताया कि जांच के दौरान ट्रैफिक पुलिस कर्मियों के खिलाफ कोई आरोप नहीं पाया गया इसीलिए सिर्फ करिया और सतेंद्र के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है। मामले की तफ्तीश जारी है, इसमें आगे जिसकी भी संलिप्तता सामने आएगी वह कार्रवाई की जद में आएगा।
तीन सौ रुपये है इंट्री शुल्क
प्रमोद ने बताया कि उन्होंने जो स्टिंग ऑपरेशन किया था उसमें सत्येंद्र और करिया ने बताया था कि देहात परमिट वाले टेंपो सहित अन्य वाहनों को शहर में चलने के लिए प्रतिमाह तीन सौ रुपया देना पड़ता है। तीन सौ रुपये देने के बाद ऐसे वाहनों को कोई परेशान नहीं करता। इस काम में कैंट थाने के एक कारखास की भी बड़ी भूमिका है।