वाराणसी। शास्त्रीय गायन की ध्रुपद शैली के इकलौते तीर्थ तुलसी घाट पर शुक्रवार की शाम चार दिनी ध्रुपद मेले का शुभारंभ हुआ। इस आयोजन में देश दुनिया से पहुंचे ध्रुपद प्रेमियों के चेहरे पर संगीत साधना की रंग देखते बनी। महाराजा बनारस विद्या न्यास के तत्वावधान में शुरू हुए इस समारोह की शुरूआत राज परिवार के अनंत नारायण, संकट मोचन मंदिर के महंत प्रो. विश्वंभरनाथ मिश्रा और पद्मश्री डॉ. राजेश्वर आचार्य ने दीप प्रज्ज्वलित करके किया। इसके बाद सुरसरी तट पर ध्रुपद संगीत की बयार बहने लगी, जिसमें श्रोता गोते लगाते रहे।
संगीत का पहला कार्यक्रम काशी के प्रमुख कलाकार डॉ. राजेश सेंड के ध्रुपद गायन से हुआ। जिसमें उन्होंने राग भूप में अलाप की दो रचनाएं सुनाईं। इसके बाद चार ताल में निबद्ध प्रथम ध्रुपद रचना सुनाई, जिसके बोल थे तू ही सूर्य तू चंद्र, वहीं सूल ताल में निबद्ध रचना... जिसके बोल थे तेरो मन में कितनो गुण सुनाकर सभी को आनंदित किया। इस दौरान पखावज पर आदित्य दीप, सारंगी पर विनायक सहाय ने संगत की। दूसरी प्रस्तुति देवब्रत मिश्र की रही, जिन्होंने सुरबहार वादन की प्रस्तुति दी। उनके साथ पखावज पर अंकित पारिख, तानपुरे पर अमेरिका के वेड इवांस ने संगत की। कार्यक्रम में देशी विदेशी बड़ी संख्या में संगीत प्रेमी उपस्थित रहे। संचालन डॉ. प्रीतेश आचार्य ने किया।
राज परिवार की तिसरी पीढ़ी संभालेगी ध्रुपद महोत्सव
कार्यक्रम के शुभारंभ के बाद अपने उद्बोधन में राज परिवार के कुंवर अनंत नारायण ने कहा कि इस महोत्सव में देश के साथ ही विदेशी कलाकारों की प्रस्तुति होती है। ऐसे में इसका नाम अंतर्राष्ट्रीय ध्रुपद मेला करना चाहिए। इस दौरान वे अपने बड़े पुत्र अनिरुद्ध नारायण सिंह को भी साथ लाए थे और कहा कि अब इन लोगों को भी ध्रुपद मेले से जोड़ा जाए, ताकि ये लोग इस आयोजन को और आगे बढ़ा सकें। उन्होंने बताया कि ये संगीत की शिक्षा भी ले रहे हैं। जबकि दूसरे पुत्र प्रदुमभनन नारायण सिंह को भी तबले की शिक्षा लेने के बारे में बताया। इस दौरान उन्होंने पद्मश्री मिलने पर डॉ. राजेश्वर आचार्य को बधाई दी।