वाराणसी। रूपवाणी में शनिवार को एक ऐसे नाटक का मंचन किया गया, जिसमें पहले से कोई कथा नहीं थी बल्कि मंच पर ही कथा गढ़ी गई और उसका अभिनय हुआ। अपने आप में एक अलग तरह का मंचन देख सभी आश्चर्य चकित रह गए। इस दौरान बैंकग्राउंड में बज रहे धुनों ने नाटक के मंचन में अपना भरपूर सहयोग किया।
रूपवाणी के अभिनेता नय-नये प्रयोग पर ख़ूब मेहनत कर रहे हैं. ध्यान, एकाग्रता और शारीरिक व्यायाम के रोज़ाना अभ्यास के बाद संवाद के ज़रिये एक ऐसा नाटक तैयार किया है, जिसमें कोई कहानी नहीं है, कोई निश्चित सिलसिला नहीं है। यहां तक कि चरित्र भी नहीं हैं, विशेषता यह है कि इस प्रस्तुति में दर्शक को अभिनय देखकर अपने अनुसार नाटक की कहानी गढ़ना है। शनिवार को हुई आधे घंटे की प्रस्तुति ने दर्शकों को एक अलग ही अनुभव दिया। इस प्रयोग में संवेदना और भावों का कुशल इस्तेमाल देखने को मिला। हंसी, विलाप, चीख और बोले गये संवादों की मदद से इस कहानी विहीन नाटक को और दिलचस्प बना दिय। नाट्य कला में इसका प्रयोग करने वाले व्योमेश शुक्ल ने बताया कि जीवन अप्रत्याशित है. हमारा समय अपने आप में ही बहुत ज़्यादा नाटकीय है। हम लोग एक ऐसा समाज बन गये हैं जो ख़ुद में ही एक नाटक है और जिसे अलग से किसी नाटक की जरूरत नहीं है। यह कोशिश इसी सोच का नतीजा है, हमने ज़िंदगी के सबसे नये पैटर्न को परंपरा की देहभाषा में पहचानने की कोशिश की है। यह तरीक़ा एक अभिनेता की तैयारी में भी काफी जरूरी साबित हो सकता है। नाटक में कलाकार स्वाति विश्वकर्मा, तापस शुक्ल, आकाश देववंशी, नंदिनी विश्वकर्मा, काजोल त्रिपाठी, साखी शुक्ल, शाश्वत त्रिपाठी शामिल रहे।