वाराणसी। ठुमरी गायिका बिलांबिता बनिसुधा का कहना है कि सावन की फुहार शुरू होते ही मल्हार रागों की बंदिशें गूंजने लगती हैं। पेड़ों पर सावन के झूले पड़ते ही मन गुनगुनाने लगता है। मेघ मल्हार, सुर दासी मल्हार, मियां मल्हार की बंदिशें इस मौसम का वर्णन बखूबी करते हैं लेकिन उल्लास और उमंग से भरा ये सुहावना मौसम नारी के विरह की पीड़ा को और बढ़ा देता है। दादरा की इस बंदिश में इसका वर्णन कुछ इस तरह मिलता है, ‘बीती जाए बरखा ऋतु सजन नहीं आए...’।
वसंत महिला महाविद्यालय राजघाट की असिस्टेंट प्रोफेसर बिलांबिता बनिसुधा बताती हैं कि संगीत में रागों का अपना महत्व है। रागों के अनुसार सुरों का प्रयोग होता है। कहती हैं कि ऋतु के अनुसार राग का अपना महत्व है। श्रावण मास में मियां मल्हार, सुर दासी मल्हार, राम दासी मल्हार, मेघ मल्हार के साथ राग देश खूब गाया जाता है। राग मियां मल्हार की बंदिश सुनाती हैं, ‘गरज गरज घर बरसे बदरा, गरज बरस न तू आई रे सखी...’। सावन में सखियाें की हंसी ठिठोली, झूलों पर उनकी मस्ती का आलम छा जाता है।
डॉ. बनिसुधा कहती हैं कि सावन में मौसम का सौंदर्य देखते बनता है। प्रेम के साथ इसमें विरह और यौवन का भी वर्णन देखने को मिलता है। ठुमरी अंग कजरी सुनाती हैं, ‘घिरी आई रे कारी बदरिया, राधा बिन लागे ना मोरा जिया...’। इस बंदिश में विरह का वर्णन है। कहती हैं कि सावन में कजरी का भी अपना महत्व है। लोकगीतों में बनारस और मिर्जापुर की कजरी मशहूर है। ठुमरी अंग की कजरी गुनगुनाती हैं, ‘झिर झिर बरसे सावन में रस बूंदिया कि आई गइले ना अब बरखा बहार...’। हमरे संवरिया नहीं आए सजनी छाई घटा घनघोर, बादल गरजे बिजुरी चमके डरपत जियरा मोर...। ये कजरी भी सावन में खूब गाई जाती है।
विश्व भारती शांति निकेतन की गोल्ड मेडलिस्ट बिलांबिता बनिसुधा ने कई मंचों पर अपने गायन का जादू बिखेरा है। आईटीसी संगीत रिसर्च एकेडमी कोलकाता में विदुषी श्रुति सडोलीकर की शिष्या रहीं। विश्व भारती शांति निकेतन के प्रो. मोहन सिंह से उन्होंने हिंदुस्तानी गायन सीखा। प्रो. सुनिर्मल भट्टाचार्य से ध्रुपद और सुचरिता गुप्ता से ठुमरी, दादरा, होरी, चैती की शिक्षा ली। प्रो. ऋत्विक सान्याल के निर्देशन में पीएचडी की। संगीत मणि अवार्ड से नवाजी जा चुकी हैं।