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सूख रही गंगा, कराह रहे जलचर

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सीतामढ़ी। मोक्षदायिनी गंगा के जलस्तर में लगातार कमी के चलते घाटों पर पानी की जगह रेत के टीले दिखने लगे हैं। गंगा की धारा सिकुड़ कर नहर में तब्दील होने लगी है। इससे जहां जलचरों का जीवन संकट में फंस गया है, वही श्रद्धालुओं और आम लोगों में बेचैनी बढ़ गई है। गंगा के तटीय क्षेत्र के गावों का भूजल स्तर भी खिसकता जा रहा है। कोनिया क्षेत्र के गांवों में लगे हैंडपंप साथ छोड़ने लगे हैं, जिससे पेयजल संकट गहराने लगा है।
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उत्तराखंड में जगह-जगह बने बांधों के कारण अपने अस्तित्व के लिए जूझ रही गंगा की हालत दिनोदिन खराब होती जा रही है। प्रदूषण के साथ ही दिनोंदिन गंगा का जलस्तर घटता जा रहा है। भीषण गर्मी के चलते इन दिनों जलस्तर में काफी गिरावट आ गई है। जहां अथाह पानी होता था, वहां इस समय रेत के टीले निकल आए हैं। यही नहीं, घाटों के कई मीटर दूर गंगा चली गई हैं। यह हाल सीतामढ़ी के साथ ही रामपुर, बिहरोजपुर समेत अन्य सभी घाटों पर है। जलस्तर घटने से प्रतिदिन दर्शन-पूजन के लिए आने वाले आस्थावानों की चिंता जहां बढ़ गई है। केंद्रीय जल आयोग के मीटर गेज सीतामढ़ी कार्यालय के आंकड़ों पर गौर करें तो 24 मई 2017 को गंगा में जलस्तर जहां 4.500 मीटर था, वहीं रविवार को 3.980 मीटर रिकार्ड किया गया। इस तरह पिछले वर्ष की तुलना में इस समय आधा मीटर तक जलस्तर कम हो गया है। यही नहीं, गंगा के जलस्तर में घटाव का क्रम अभी जारी है। ऐसे में माना जा रहा है कि जून में गंगा की हालत और खराब होगी, जिसके कारण तटवर्ती इलाके के गांवों में पेयजल का भारी संकट उत्पन्न होगा।
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