वाराणसी। इंजीनियरिंग के गूढ़ फार्मूले के बजाय हिंदी के शब्दों में इनका मन लगा था। मां-पिता के सपने के लिए इन्होंने इंजीनियरिंग तो कर ली लेकिन अपने शौक को भी जिंदा रखा। लिखने की धुन ऐसी सवार हुई कि बीटेक के आखिरी पेपर के दिन इनका पहला नॉवेल प्रकाशित हो गया। हम बात कर रहे हैं बनारस आजमगढ़ के बार्डर पर बसे लालगंज के निलेश शर्मा की। 24 साल की उम्र में उनका पहला उपन्यास ‘मिस्टर इरिटेटिंग’ प्रकाशित हो गई है। बतौर लेखक उन्हें जाना जाने लगा है।
लखनऊ के बाबू बनारसी दास कॉलेज से हाल में ही इंजीनियरिंग पूरी कर चुके निलेश शर्मा को बचपन से ही लिखने-पढ़ने का शौक था। स्कूल के दौरान ही उन्होंने कविताएं लिखना शुरू कर दिया था। कुछ लघु कहानियां भी लिखीं थीं। राजकीय क्वींस इंटर कॉलेज में उन्होंने पढ़ाई की। इसके बाद लखनऊ चले गए। निलेश बताते हैं कि इंजीनियरिंग के चार साल के दौरान हमारे पास बहुत कुछ करने का समय होता है। अपनी कॉलेज लाइफ पर ही मैंने अपनी पहला नॉवेल लिखा। ये एक लव ट्राइएंगल है। इसमें एक ऐसा किरदार है जिसे लोग मिस्टर इरिटेटिंग बुलाते हैं। इसमें पचास फीसदी सच्चाई तो उतना ही फिक्शन है।
निलेश ने बताया कि इस नॉवेल को पूरा करने में चार महीने का वक्त लगा था। मैंने प्रकाशकों के बहुत चक्कर काटे। ये मेरा सौभाग्य था कि लखनऊ में एक बुक फेयर के दौरान आईएएस राकेश मित्तल से मिला। उन्होंने ही मुझे अपने प्रकाशक से मिलवाया। उन्हें मेरी ‘मिस्टर इरिटेटिंग’ अच्छी लगी। ये संयोग ही था जिस दिन मेरा बीटेक का लास्ट पेपर था, उस दिन मेरा नॉवेल प्रकाशित हुआ। इसका इंग्लिश अनुवाद भी जल्द आ रहा है। एक नॉवेल और लिख रहा हूं जो मोटीवेशनल है। इसका जिक्र मैंने अपने पहले नॉवेल में किया है। आगे मैं बॉलीवुड के लिए कहानियां लिखना चाहता हूं। प्रेमचंद को पसंद करता हूं। कहते हैं लोग अब हिंदी नॉवेल पढ़ रहे हैं। नई वाली हिंदी ने उनमें खासकर युवाओं में ये क्रेज पैदा किया है।