अभियोजन के अनुसार, 12 नवंबर 2013 को तत्कालीन पुलिस अधीक्षक (अपराध) कमलेश दीक्षित अपनी टीम के साथ वांछित और इनामी अपराधियों की धरपकड़ के लिए लहरतारा ओवरब्रिज पर चेकिंग अभियान चला रहे थे। इसी दौरान मुखबिर से सूचना मिली कि लूट और चोरी की घटनाओं में शामिल कुछ बदमाश मंडुवाडीह की ओर से तीन बाइकों पर सवार होकर आ रहे हैं। पुलिस टीम ने संदिग्धों को रोकने का प्रयास किया, लेकिन घेराबंदी देख बदमाश बाइक छोड़कर भागने लगे और पुलिस पर फायरिंग शुरू कर दी।
फायरिंग के दौरान चली एक गोली पुलिस अधीक्षक कमलेश दीक्षित की बुलेटप्रूफ जैकेट के बाईं ओर लगी, जिससे वे बाल-बाल बच गए। इसके बाद पुलिस टीम ने पीछा कर छह आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया और उनके पास से अवैध असलहा व कारतूस बरामद किए।
जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने चार अभियुक्तों के साथ अरुण उर्फ नखड़ू और अजय यादव के खिलाफ भी आरोपपत्र दाखिल किया था। सुनवाई के दौरान अरुण उर्फ नखड़ू और अजय यादव ने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया, जिसके चलते उनकी पत्रावली अलग कर दी गई। उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर अदालत ने चारों अभियुक्तों को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई। अदालत के इस फैसले को पुलिस पर हमले जैसे गंभीर मामलों में कड़ा संदेश माना जा रहा है।