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सरकारी शिक्षा व्यवस्था को खत्म करने की हो रही साजिश

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वाराणसी। शिक्षा व्यवस्था बड़े ही कठिन दौर से गुजर रही है। हमारी जो संचित ज्ञान राशि है उसके लिए हमारे मनीषियों ने बहुत तपस्या की है। यह आज भी ग्रंथों एवं पांडुलिपियों के रूप में हमारे बीच में मौजूद है। हम सभी को बच्चों की क्षमता एवं योग्यता के अनुरूप ही उन्हें शिक्षित करना चाहिए। वर्तमान में सरकारी शिक्षा प्रणाली को दरकिनार कर निजी संस्थाओं को वरीयता दी जा रही है जो अत्यंत चिंता का विषय है। ऐसा लगता है कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था को खत्म करने की साजिश रची जा रही है। उक्त बातें महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के कुलपति प्रो. गिरिश्वर मिश्र ने कहीं।
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वह रविवार को महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के शिक्षा संकाय में आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे। भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद, साहित्य अकादमी नई दिल्ली, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान लखनऊ, शिक्षा शास्त्र विभाग काशी विद्यापीठ एवं विद्याश्री न्यास के संयुक्त तत्वावधान में शिक्षा, दर्शन और समाज विषयक गोष्ठी का आयोजन किया गया था। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एनसीआरटी के पूर्व शिक्षा निदेशक प्रो. जेएस राजपूत ने कहा कि हमें अपनी शिक्षा व्यवस्था को समझना होगा। हमें अच्छे विचारों को अगली पीढ़ी को देना होगा और प्राचीन संस्कृति को समझना होगा। जय प्रकाश विश्वविद्यालय छपरा के कुलपति प्रो. हरिकेश सिंह ने कहा कि आयातित शिक्षा व्यवस्था सर्व साधारण के लिए उचित नहीं हो सकती है। अरुणेश नीरन ने कहा कि शिक्षा में अध्ययन, मनन, प्रयोग, प्रवचन चार मुख्य अवयव हैं, जिन्हें हमें शिक्षा के मूल में सम्मिलित करना होगा।
दूसरे सत्र में राजशरण साही ने कहा कि शिक्षा जब जीवन के वास्तविक संदर्भों एवं मूल्यों से जुड़ती है तभी वह मूल्यवान होती है। लखनऊ विश्वविद्यालय की प्रो. अलका पांडेय ने शोध पत्र को प्रस्तुत करते हुए कहा कि शिक्षा में दर्शन और ज्ञान की प्रधानता है। माखन लाल चतुर्वेदी पत्रकारिता संस्थान भोपाल के पूर्व कुलपति प्रो. अच्युतानंद मिश्र ने कहा कि वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में जो नैतिकता की कमी है अगर समाप्त हो जाए तो शिक्षा में काफी सुधार किया जा सकता है। तृतीय सत्र में दिल्ली विश्वविद्यालय के पवन सिन्हा ने कहा कि यह दुर्भाग्य की बात है कि विश्व का सबसे युवा देश का अपनी कोई शिक्षा नीति या चिंतन नहीं है। तृतीय सत्र में भारती गोरे, गीता वर्मा ने अपना मत प्रस्तुत किया। सत्र की अध्यक्षता डॉ. भारती बवेजा ने की। राष्ट्रीय संगोष्ठी के प्रारंभ में विद्याश्री न्यास सचिव डॉ. दयानिधि मिश्रा ने मंच पर विराजमान सभी वक्ताओं का स्वागत किया। संगोष्ठी में डॉ. बब्बन सिंह, गोपाल नायक, सुरेंद्र राम, शंभू उपाध्याय, राघवेंद्र प्रताप, संजय, वीके निर्मल , संजय श्रीवास्तव, ध्रुव नारायण, सत्येंद्र आदि लोग उपस्थित थे।
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