वाराणसी। ‘निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल, बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल’। पराधीनता की बेड़ियों में जकड़े देशवासियों के मन में अपनी मातृभाषा के प्रति गौरव का भाव जगाने वाले भारतेंदु हरिश्चंद्र पर केंद्रित 1174 पृष्ठों के ग्रंथ ‘भारतेंदु समग्र’ का प्रकाशन पिछले आठ साल से बंद हो चुका है। हिंदी खड़ी बोली के उन्नायक भारतेंदु बाबू की कृतियां तो प्रकाशकों के पास हैं पर इस दुर्लभ ग्रंथ का प्रकाशन करने वाले संस्थान के पास भी इसकी मात्र एक प्रति ही बची है। हिन्दी प्रचारक पब्लिकेशन्स ने अब इस पुस्तक का प्रकाशन पूरी तरह बंद कर दिया है।
पब्लिकेशन्स ने सबसे पहले पिशाचमोचन स्थित कार्यालय से 1987 में भारतेंदु समग्र का प्रकाशन किया था। प्रचारक ग्रंथावली योजना के तहत प्रकाशित इस ग्रंथ में बाबू बृजरतन दास की भारतेंदु नाटकावली, शिव प्रसाद मिश्र की भारतेंदु ग्रंथावली, शिवनंदन सहाय की हरिश्चंद्र जैसी दुर्लभ पुस्तकों के समावेश के साथ ही कवि वचन सुधा, हरिश्चंद्र मैगजीन, बाला बोधिनी समेत भारतेंदु बाबू की अन्य रचनाएं समाहित की गई थीं।
इस ग्रंथ में भारतेंदु की कविताएं, संपादकीय टिप्पणियां तो हैं ही, अंत में चंद्रास्त व भारतेंदु जी की जीवनी है। चंद्रास्त वह व्यथा भरा भावोद्गार है जिसे भारतेंदु जी के अनन्य मित्र पं. रामशंकर व्यास ने उनके निधन की दुखद सूचना काशीवासियों को देने के लिए छपवाकर मुफ्त बंटवाया था। हिंदी प्रचारक पब्लिकेशन्स के सह संपादक सुरेंद्र वाजपेयी ने बताया कि प्रचारक ग्रंथावली परियोजना बंद होने के कारण अब इस पुस्तक का प्रकाशन ही बंद हो चुका है। पब्लिकेशन के पास भी एकमात्र पुस्तक ही उपलब्ध है। निदेशक कृष्ण चंद्र बेरी की परिकल्पना से इस ग्रंथ का प्रकाशन संभव हुआ था।
भारतेंदु जी के प्रपौत्र दीपेश चौधरी का कहना है कि पुस्तक को दोबारा प्रकाशित कराने के लिए वीडीए उपाध्यक्ष पुलकित खरे प्रयासरत हैं और बातचीत चल रही है। संभावना है कि जल्द ही सकारात्मक परिणाम मिलेगा।