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25 दिन-25 कहानियां: कहां गया वो राजनीतिक ट्रॉमा सेंटर, सर्वत्र हारे पीड़ित की दवा अड़ियों पर ही थी

Fri, 15 May 2026 04:21 PM IST
Pragati Chand अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

Varanasi News: उत्तर प्रदेश बीजेपी प्रवक्ता अशोक पांडेय ने बताया कि 25 साल पहले तक बनारस में कई अड़ियां थीं। जहां विद्वानों की बैठक होती थी। यहां तरह- तरह की चर्चाएं होती थीं। 
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अशोक पांडेय - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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25 साल पहले तक बनारस में करीब 10 अड़ियां थीं। जहां धरती के हजारों भेदभाव चाय की भाप की तरह उड़ जाते हैं। हर आने वालों के लिए आंदोलन छेड़ दिए जाते थे। बीएचयू के चपरासी और डीन एक टेबल पर बतियाते थे। काशीनाथ सिंह जैसे विद्वान तो कह दिया करते थे कि चुप होई जा, आपन डीनगिरी जाके अपने कैंपस में कीहा। पूर्व पीएम वीपी सिंह को अस्सी पर राजर्षि की उपाधि मिली और यहीं से वो नारा निकला 'राजा नहीं फकीर है देश की तकदीर है।' 

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टेलीफोन युग जब से वेंटिलेटर पर आया, जब मोबाइल की धाक जमी, तभी से बनारसीपन में सुराख बनने लगा है। अफसोस है कि इस पीढ़ी में काशी की वो शिल्पकारी दाखिल नहीं हो पाई जो कि अड़ीबाजों की जुबान से बिना वजह ही टपकती रहती थी। जिसमें थोड़ी-बहुत आ भी गई तो वो भी बनारसीपन का सूखा नारियल इसी मोबाइल से ही फोड़े जा रहे हैं और पुरनियों को बार-बार फ्लैशबैक में पहुंचा देते हैं।

पूर्व पीएम वीपी सिंह को अस्सी पर राजर्षि की उपाधि मिली और यहीं से वो नारा निकला ''राजा नहीं फकीर है देश की तकदीर है।'' पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर सिंह काशी के अड़ीबाज ही थे। 25 साल पहले तक बनारस में करीब 10 अड़ियां तो थीं ही, जिसमें अब सिर्फ अस्सी पर पप्पू की अड़ी का अस्तित्व है। धरती के हजारों तरह के भेदभाव इन अड़ियों पर चाय की भाप की तरह उड़ जाते हैं। कभी बीएचयू के चपरासी और डीन एक ही साथ चाय पीते थे तो कहीं बहस छिड़ जाती। काशीनाथ सिंह जैसे विद्वान तो कह दिया करते थे कि चुप होई जा, आपन डीनगिरी जाके अपने कैंपस में कीहा। बराबरी का ये सहज मिजाज बनारसीपन ही था।
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लंका पर टंडन चाय की अड़ी कहां गई? कहां गया गोदौलिया का वो राजनीतिक ट्रॉमा सेंटर। कोई पीड़ित कहीं से भी हार जाता था तो रेफर होकर यहीं गौदोलिया के सुशील सिनेमा के पास द रेस्टोरेंट पर चाय पीता दिखता था। उनकी दवा इन्हीं अड़ियों पर होती थी। उनके बंदोबस्त के लिए बाकी के अड़ीबाज प्रशासकों-नेताओं से वार्ता करने चल देते थे या फिर सड़कों तक आंदोलन मचा देते थे। विख्यात छात्र नेता मजूमदार जी यहीं पर चाय पीकर आंदोलनों की योजनाएं तैयार किया करते थे।

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लहुराबीर प्रकाश टॉकीज के बगल में और मैदागिन चौराहे पर उस समय जितने अड़ीबाज होते थे, आज वहां उतने पर्यटक नहीं दिखते। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर सिंह, पूर्व सांसद रघुनाथ सिंह, मंत्री रहे प्रभु नारायण सिंह, इंदिरा गांधी को हराने वाले राज नारायण, सत्यनारायण, कमलापति और दक्षिण में मंत्री रहे रुस्तम सैटीन ये सब एक नंबर के अड़ीबाज रहे। कई बार तो लकदक वस्त्रों और कान में फाहा लगाकर अड़ी बैठ जाती थी तो फिर कोई कह दे कि अमिताभ बच्चन इधर से जात हवन त अड़ीबाज बोलता है कि जाये दा हरिवंश राय बच्चनवा के लड़कवा हव।

गमछा पहनना कलाकारों को कितना भाता था। भारत रत्न बिस्मिल्लाह खां, गुदई महाराज, पं. किशन महाराज, गोपी कृष्ण, पं. राजन-साजन हर कोई दोपहर में गमछा पहनकर चबूतरे पर ही बैठा रहे। वाद्य यंत्र नहीं बेना हिलाते हुए ताश-कैरम का चस्का छाया रहता था। चाहे रईस इंस्पेक्टर हो, कलेक्टर हो या रानी-महतरानी हर कोई लूडो का भी खिलाड़ी हुआ करता था।

सांझ को नैया पे गमछा पहने पूरी गोल उस पार जा के काजू-किशमिश, भांग मुनक्का मिला के दिव्य छनाई करती थी। फिर स्नान-ध्यान, कसरत भी हो जाते थे। लेकिन रियाज अब रेत पर नहीं एसी वाले बंद कमरों में हो रहा, जिससे दिल घबरा रहा है और कई जानलेवा रुझान चंद वर्षों से दिख भी रहे हैं। यही सब बनारसीपन था और बनारस में ही ये समाधि लेने लगा है। वो दौर था जब यहां का वासी सुबह उठकर हाथ जोड़कर कहता था कि जागा हो भोले, माई के भी जगा दा। गणेश के भी उठा के रियाज करावा और कार्तिकेय छोटा है न इनके सोए दा। -अशोक पांडेय, प्रवक्ता बीजेपी उत्तर प्रदेश 
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