लहुराबीर प्रकाश टॉकीज के बगल में और मैदागिन चौराहे पर उस समय जितने अड़ीबाज होते थे, आज वहां उतने पर्यटक नहीं दिखते। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर सिंह, पूर्व सांसद रघुनाथ सिंह, मंत्री रहे प्रभु नारायण सिंह, इंदिरा गांधी को हराने वाले राज नारायण, सत्यनारायण, कमलापति और दक्षिण में मंत्री रहे रुस्तम सैटीन ये सब एक नंबर के अड़ीबाज रहे। कई बार तो लकदक वस्त्रों और कान में फाहा लगाकर अड़ी बैठ जाती थी तो फिर कोई कह दे कि अमिताभ बच्चन इधर से जात हवन त अड़ीबाज बोलता है कि जाये दा हरिवंश राय बच्चनवा के लड़कवा हव।
गमछा पहनना कलाकारों को कितना भाता था। भारत रत्न बिस्मिल्लाह खां, गुदई महाराज, पं. किशन महाराज, गोपी कृष्ण, पं. राजन-साजन हर कोई दोपहर में गमछा पहनकर चबूतरे पर ही बैठा रहे। वाद्य यंत्र नहीं बेना हिलाते हुए ताश-कैरम का चस्का छाया रहता था। चाहे रईस इंस्पेक्टर हो, कलेक्टर हो या रानी-महतरानी हर कोई लूडो का भी खिलाड़ी हुआ करता था।
सांझ को नैया पे गमछा पहने पूरी गोल उस पार जा के काजू-किशमिश, भांग मुनक्का मिला के दिव्य छनाई करती थी। फिर स्नान-ध्यान, कसरत भी हो जाते थे। लेकिन रियाज अब रेत पर नहीं एसी वाले बंद कमरों में हो रहा, जिससे दिल घबरा रहा है और कई जानलेवा रुझान चंद वर्षों से दिख भी रहे हैं। यही सब बनारसीपन था और बनारस में ही ये समाधि लेने लगा है। वो दौर था जब यहां का वासी सुबह उठकर हाथ जोड़कर कहता था कि जागा हो भोले, माई के भी जगा दा। गणेश के भी उठा के रियाज करावा और कार्तिकेय छोटा है न इनके सोए दा। -अशोक पांडेय, प्रवक्ता बीजेपी उत्तर प्रदेश