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25 दिन-25 कहानियां: हर महीने फ्लाइट से दिल्ली सिर्फ इंटरनेशनल फोन करने जाता था, पढ़ें काशी की रोचक जानकारी

Tue, 26 May 2026 03:28 PM IST
Aman Vishwakarma अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

बनारस इंडस्ट्रियल ट्रेड एसोसिएशन के अध्यक्ष अशोक गुप्ता ने बताया कि बनारस में भांग आम थी। लोग इसे महादेव का प्रसाद कहते थे। शराब वगैरह छोटी जात वाले पीते हैं ऐसा मानते थे। बड़ा आदमी का नशा भांग और ठंडाई से होता था। एक मिठाई बनती थी महंत की बर्फी, मायूम नाम था। भांग से बनी होती थी, आज भी एक दो लोग छिपकर बनाते हैं। बुढ़वा मंगल में बजड़े पे नाचने वाली बुलाई जाती थीं। उप शास्त्रीय गायन होती थी। महाराजा बनारस का एक बजड़ा था मोरपंखी, उसमें रात भर आयोजन चलता था। टोपी पहन, इत्र लगाकर, भांग पीते हुए लालटेन में नाच देखते थे।
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बनारस इंडस्ट्रियल ट्रेड एसोसिएशन के अध्यक्ष अशोक गुप्ता। - फोटो : संवाद
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विस्तार
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पिछले 25 से 30 साल में काशी ने सिर्फ अपना चेहरा नहीं बदला, उसने अपने कारोबार की भाषा भी बदल दी। बनारस का व्यापारी संतोषी था। रबड़ी मलाई बेचने वाले शाम चार बजे दुकान खोलते थे। माल अगर पांच बजे बिक गया तो दुकान बंद कर देते थे। जहां छह बजे नहीं कि असली बनारसी नाव ले कर निकल पड़ते थे और उस पर भांग घोटते थे। ये लोग उस पार रेत पर पेशाब करने जाते थे। 

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साड़ी कारोबारी दोपहर एक-दो बजे दुकानें खोलते थे। दुकानदार सावजी लोग कहलाते थे। कुंज गली में लोगों की दुकान होती थी, वहां बुनकर साड़ी लेकर आते थे। दाम लगता था, नकद पैसा चाहिए तो एक आना का कमीशन काटकर तुरंत भुगतान कर देते थे। नहीं तो पंद्रह दिन महीना भर लग जाता था। 

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बृजपाल दास पुराने रईस थे। राजा रजवाड़ा बंबई कलकत्ता तक साड़ी का बंडल अपने कंधे पर रखकर बेचकर आते थे। महाराजा सिंधिया, पटियाला के यहां जाते थे। पहली बड़ी इंडस्ट्री लग डीएलडब्ल्यू। लाल बहादुर शास्त्री रेल मंत्री थे तब। मोतीझील वाले बनारस कॉटन मिल लेकर आए। बद्री बाबू घंटी मिल चालू की जो साइकिल की घंटी बनाते थे। ये सभी अब बंद हो गईं। अगली पीढ़ियों ने अपडेट नहीं किया। 

काशी के रईस मशहूर थे। काशी नरेश विभूति नारायण सिंह को लोग भगवान मानते थे। देखते ही हर हर महादेव का नारा लगाते थे। वे मेयो के पढ़े थे, विद्वान भी थे, लेकिन बोलने में हकलाते थे। शाह खानदान के झक्कड़ साव होली पे बरामदे में बैठकर अपनी गली से निकलने वालों पर पान की पीक फेंक देते थे। वो गाली देता था। तो खूब हंसते और फिर उसे नया कुर्ता पायजामा देते थे। 

शिव प्रसाद गुप्त थे, बहुत बड़े दानी थे। उन्होंने अस्पताल बनवाया। विद्यापीठ की जमीन दान में दी। मालवीय जी के लिए दोपहर के भोजन का कच्चा सामान उन्हीं के यहां से जाता था। 

होली पर अस्सी और दशाश्वमेध पर कवि सम्मेलन होता था। गालियों से ही बात होती थी। शहर का जो सबसे पॉपुलर, प्रतिष्ठित आदमी है उसे गाली पड़ती थी। लोग चाहते थे हमें गाली पड़े। इसके लिए पैसा खर्च करते थे। संपूर्णानंद और कमलापति त्रिपाठी जैसे लोगों को सबसे ज्यादा गाली पड़ती थी और वो खुश होते थे। एक डीएम भूरेलाल को ये खराब लगा। उन्होंने कह दिया सम्मेलन नहीं होगा, तो हर बार से दुगुनी भीड़ आई और डीएम को बहुत गाली दी गई।

बनारस में एक फ्लाइट चलती थी, दिल्ली आगरा खजुराहो काठमांडो। इसमें विदेशी टूरिस्ट आते थे। शहर के बड़े आदमी लोग भी चलते थे। हमारा एक्सपोर्ट का काम था। मैं खुद 1971-73 तक इसी फ्लाइट से दिल्ली जाता था। वहां एयरपोर्ट और कनॉट प्लेस पर पीसीओ से इंटरनेशनल कॉल करते थे और उसके बाद ट्रेन पकड़कर लौट आता था। हर महीने उस फ्लाइट से सिर्फ इंटरनेशनल फोन करने जाता था। तब फैक्स नहीं था। 20 दिन में तो चिट्ठी पहुंचती थी।
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गलियों में दुकानें नहीं थी, अतिक्रमण नहीं था। बहुत सी गलियों में रिक्शे चले जाते थे। ठठेरी बाजार में रिक्शा ले जाते थे। इक्के की रेस होती थी। शहर के रईस उनके पास बढ़िया घोड़े थे। वो रेस लगाते थे, पैसे इनाम में देते थे। गंगा में मल्लाहों की रेस होती थी नाव की। मंडुआडीह, लहरतारा, चौकाघाट या औद्योगिक इलाके 1962 के आसपास बने हैं। उसके पहले यह खेत थे। घाट के किनारे जमीनें आसानी से मिल जाती थी कोई खरीदता ही नहीं था।  

बनारस को जानने वाले लोग यह बात जरूर मानेंगे कि शहर की मस्ती कहीं पीछे छूट गई है। पहले कारोबार में जल्दबाजी कम थी, लोग ज्यादा मिलते थे। अब बाजार तेज हो गया है, लेकिन फुर्सत कम हो गई है। फिर भी, काशी की असली ताकत यही है कि उसने अपने पुरानेपन को पूरी तरह छोड़ा नहीं और आधुनिकता को पूरी तरह ठुकराया भी नहीं। 

घाट अब भी हैं, गलियां अब भी हैं, लेकिन उन्हीं गलियों से अब दुनिया भर के बाजारों तक पहुंचने वाले सपने निकल रहे हैं। तांगे से रोपवे तक की यह यात्रा सिर्फ शहर के बदलने की कहानी नहीं, बल्कि उस बनारस की कहानी है जिसने अपनी परंपरा को कारोबार में बदल दिया।
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