वाराणसी। आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रवर्तक भारतेंदु हरिश्चंद्र की विरासत को संजोना सिर्फ उनके परिजनों का कर्तव्य नहीं बल्कि यह हम सबका भी है। प्रत्येक हिंदी सेवी की जिम्मेदारी है कि वह भारतेंदु बाबू की थाती को संभालने के लिए अपने योगदान पर चिंतन-मनन करे। उक्त बातें साहित्यकार डॉ. नीरजा माधव ने कहीं। वह रविवार को भारतेंदु भवन में आयोजित भारतेंद्र स्मरण गोष्ठी को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रही थीं।
अध्यक्षता करते हुए नाट्यविद डॉ. राजेंद्र उपाध्याय ने भारतेंदु भवन से जुड़ी अपनी स्मृतियों की चर्चा की। विशिष्ट अतिथि मराठी और हिंदी रंगमंच के सशक्त हस्ताक्षर नारायण द्रविड़ ने बताया कि किस प्रकार पहली बार 1975 में उन्होंने इसी भारतेंदु भवन में उस दौर के दिग्गज रंगकर्मियों के साथ अइबी-गइबी नाटक का मंचन किया था जो बनारस की बहरी अलंग की संस्कृति पर आधारित था।
गोष्ठी में राजलक्ष्मी मिश्रा, प्रियंका मेहरोत्रा, आकाश देवराज श्रीवास्तव, सत्यम मिश्रा, चित्रा वर्मा, काशिका वर्मा, कुमार लक्ष्य, सौरभ चक्रवर्ती, आशुतोष पांडेय प्रमुख रूप से उपस्थित थे। आरंभ में आगतों का स्वागत सलीम राजा, संचालन प्रतिमा सिन्हा और धन्यवाद ज्ञापन अशोक आनंद ने किया।
सेतु के 16वें राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव के छठें दिन एक अप्रैल को दो नाटकों का मंचन होगा। भोपाल के रंगकर्मियों द्वारा हास्य नाटक मैं भी मां बन गया... का मंचन होगा। दूसरा नाटक बनारस के कलाकारों द्वारा लिटिल मून एकेडमी के बैनर तले होगा। प्रेमचंद की कहानी कफ न का मंचन बालमुकुंद त्रिपाठी के निर्देशन में होगा।
हिंदी रंगमंच दिवस की पूर्व संध्या पर दो अप्रैल को भारतेंदु दीपावली मनाई जाएगी। मैदागिन स्थित कंपनी बाग में स्थापित भारतेंदु प्रतिमा के समक्ष दीपदान सायंकाल साढ़े पांच बजे किया जाएगा।