वाराणसी। 1984 के सिख विरोधी दंगा मामले में न्यायालय से एक दोषी को मृत्युदंड व दूसरे को उम्रकैद दिए जाने के बाद दंगे का शिकार हुए लोगों की आंखों में एक बार फिर दर्द छलक उठा है। जहां एक ओर इस फैसले को लेकर खुशी जताई जा रही हैं तो वहीं आंखों के आंसू अपनों के खोने का दर्द बयां कर रहे हैं। वाराणसी में भी दंगों की आग में कई घर जले थे।
31 अक्तूबर 1984 में हुई आगजनी की कालिख आज भी घर की दीवारों से मिट नहीं सकी है। दंगे का शिकार काशी नाथ गुजराल के बेटे सतेंद्र, मंजर को याद कर रो पड़ते हैं। 1950 में काशी नाथ गुजराल अपने छोटे भाई जोगेंद्र के साथ पंजाब से आकर बनारस में बस गए। लंका पर सरदार स्टोर्स के नाम से मेडिकल की दुकान शुरू की। उनके भाई सरदार प्रॉविजन स्टोर्स की दुकान चलाने लगे। काशीनाथ गुजराल बैंक में नौकरी करते थे। दुकान के पिछले हिस्से में परिवार रहता था। दंगाइयों ने दुकान समेत पूरे घर को फूंक दिया था जिसमें परिवार के लोग तो बच कर निकल गए लेकिन काशीनाथ गंभीर रूप से झुलस गए और बीएचयू में इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। इतना ही नहीं 34 सालों में इस घटना के जिम्मेदारों, गुनाहगारों को पुलिस चिह्नित तक नहीं कर सकी। बताया कि आगजनी में मारे गए या घायल लोगों को कोई कभी देखने नहीं गया। घर की दीवारों पर धुएं की कालिख दर्द भरी दास्तां को बयां कर रही है।