तिरस्कृतों को अपनाने, दुनिया का गरल सहज गटक जाने वाले काशीपुराधिपति ने महाश्मशान मणिकर्णिका में साधु-संतों, भक्तों, गणों के साथ चिता भस्म की होली खेली। ढोल-मजीरे और डमरू नाद के बीच ‘खेलैं मसाने में होरी दिगंबर...’ की धुन पर चिता भस्म और भभूत-गुलाल की अद्भुत छटा हर किसी के लिए यादगार बन गई। मसाने की होली में बाबा का भक्त मंडल तो था ही देव-दानव, भूत-पिशाच और प्रेत दल भी खिंचा चला आया। बाबा के माथे पर चिता भस्म लगाने के साथ ही हर हर महादेव के उद्घोष के साथ होली शुरू हुई तो फिर मणिकर्णिका महातीर्थ जलती चिताओं के बीच राग-विराग के रंगों से नहा उठा।
चिता भस्म और भभूत उड़ाते भक्तों ने जमकर होली खेली। देवाधिदेव महादेव की नगरी में इस अनूठी होली का नजारा लेने देश-विदेशों से बड़ी संख्या में लोग यहां पहुंचे। एक तरफ धधकती चिताएं और दूसरी ओर बुझी चिताओं की भस्म से होली खेलते साधु-संत और शिवभक्त। ढोल-मजीरे के साथ डमरू और शंख ध्वनि की पावन अनुगूंज। महाश्मशान मणिकर्णिका पर उत्सव के ये रंग जितने अनूठे थे, उतने ही यादगार। इससे पहले दोपहर 12 बजे मशानेश्वर महादेव की भोग आरती हुई। इसके बाद सैकड़ों भक्त डमरू, त्रिशूल के साथ चिता भस्म उड़ाकर हर-हर महादेव का उद्घोष करने लगे और शुरू हो गई काशी की पारंपरिक मसाने की होली। चिता भस्म, भभूत के साथ अबीर और गुलाल भी जमकर उड़ाए गए। चिताएं लग रही थीं, कई धधक रही थीं। इन्हीं के बीच होली का उत्सव भी चल रहा था। उत्सव के इन पलों को घाट पर मौजूद शवयात्री भी अपलक निहारते रहे। इन पलों को कैमरे में कैद करने की होड़ विदेशी पर्यटकों में लगी रही। आसपास की छतों, मुंडेरों पर लोगों की भीड़ लगी थी।