चौरी। वह महिला स्वावलंबन की मजबूत स्तंभ हैं। पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं को उनके हक के लिए जूझना न पड़े, इसके लिए वह खुद जूझीं। महिलाओं के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा दिलोदिमाग पर हावी हुआ तो घर-घर परिवार की जिम्मेदारियों के साथ उन्होंने समाजसेवा का बीड़ा उठाया और नारी शक्ति के लिए मिसाल बन गईं।
चौरी इलाके के बेदमनपुर रोटहां गांव निवासी वंदना दुबे ने 1994 में एक निजी विद्यालय में बच्चों को पढ़ाने से अपने सामाजिक जीवन की शुरुआत की। इसके बाद एक एनजीओ के साथ वनवासी बस्ती के बच्चों को तालीम देने के साथ ही गांधी आश्रम में छात्राओं को पेंटिंग का प्रशिक्षण देने लगीं। खुद के अंदर समाज के लिए बढ़ते जज्बे और समय के अभाव के कारण वंदना ने अपने इलाके के गांव की महिलाओं को पुरुष प्रधान समाज में अपने हक के लिए जागरूक करने का बीड़ा उठाया। इसके लिए महिलाओं का आर्थिक स्वावलंबन जरूरी था। इसके लिए वंदना ने गांवों में सेंटर खोलकर लड़कियों को सिलाई-कढ़ाई का प्रशिक्षण देकर उन्हें अपने पैरों पर खड़े होने के लिए प्रेरित किया। इन दिनों वह गांवों में कैंप कर महिलाओं को सरकारी योजनाओं मनरेगा, जॉबकार्ड, आरटीआई, पेंशन के प्रति जागरूक कर रहीं हैं। साथ ही छात्राओं को सशक्त नारी बनाने के लिए मार्शल आर्ट का प्रशिक्षण भी कराती हैं। उनका कहना है कि महिलाएं जब तक निडर नही होंगी, उनकी कामयाबी में कमी रहेगी। समाज सेवा का दायरा बढ़ाने के लिए उन्होंने 2004 में समाजसेवा ट्रस्ट के नाम से संस्था बनाई। सरकारी मदद न मिलने के बाद भी महिलाओं की बेहतरी के लिए वंदना के कदम बढ़ते रहे। पति के अलावा दो पुत्र और एक पुत्री की जिम्मेदारी के साथ वह समाजसेवा के लिए भी समय निकालकर सामंजस्य बनाती हैं।