कड़े थे तब के नियम
पूर्व वॉलीबॉल कोच विद्यासागर ने बताया कि वॉली पर फिंगर टच होते ही रेफरी फॉल की सीटी बजा देता था। खिलाड़ियों की तैयारी भी सादगी भरी लेकिन दमदार होती थी। चना, दूध और मक्का ही उनकी ताकत का स्रोत था। उस दौर में न सप्लीमेंट थे, न आधुनिक डाइट थी फिर भी खिलाड़ियों में जुनून और जज्बा भरपूर नजर आता था।
इनडोर तक सीमित हुआ खेल
उन्होंने बताया कि अब इंडोर स्टेडियम और प्रोफेशनल लीग का दौर है, तब बनारस का यह स्वर्णिम अध्याय कहीं पीछे छूटता दिख रहा है। लेकिन पुराने खिलाड़ी और खेल प्रेमी आज भी कहते हैं कि वॉलीबॉल ने बनारस को सिर्फ खिलाड़ी नहीं, अनुशासन और एकजुटता भी दी है।