आराजीलाइन (वाराणसी)। भारतीय कृषि सब्जी अनुसंधान संस्थान शाहंशाहपुर में आयोजित परिवर्तनशील जलवायु के संबंध में आयोजित गोष्ठी में वैज्ञानिकों ने ताप अनुकूलित फसलों के बारे में मंथन किया। रविवार को अध्यक्षता करते हुए जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय जबलपुर के पूर्व कुलपति प्रो. कल्लू गौतम ने कहा कि टमाटर कि कुछ जंगली किस्मों के जींस का प्रयोग करके नई प्रजाति की किस्में विकसित की गई हैं। यह किसानों के लिए फायदेमंद साबित होगी।
राहुरी महाराष्ट्र के कृषि विवि के पूर्व कुलपति टी ए मोरे ने कद्दू वर्गीय सब्जियों में ताप सहनशीलता के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि सिंट्रान नाम की एक खरबूजे की जंगली प्रजाति राजस्थान की जलवायु में आसानी से उत्पादित होती है। यदि इसके जीन का प्रयोग किया जाए तो वह सूखारोधी क्षेत्र के लिए लाभकारी होगी। बीएचयू के कृषि वैज्ञानिक प्रोफेसर एस रघुवंशी ने कहा कि तापमान में दशमलव छह से दशमलव सात तक की वृद्धि दर्ज की गई है। इसके कारण जल स्तर नीचे जा रहा है यह चिंतनीय है। डॉ. मेजर सिंह ने सूखा प्रतिरोधी जीन टमाटर में डालकर किए गए शोध के बारे में बताया। इसी तरह डॉ अनंत बहादुर ने भी टमाटर की एक अन्य प्रजाति काशी अमन को जलभराव में भी जिंदा रहने में सफल बताया। भारतीय कृषि अनुसंधान के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. श्रीधर ने और डॉ. सतपाल शर्मा ने भी अनुभव को साझा किए।
केरल विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ. केपी पीटर ने प्रतिकूल मौसम में भी सब्जी सहित अन्य फसलों के उत्पादन में सहयोगी बनने का कृषि वैज्ञानिकों का आह्वान किया। डॉ. डी वी आहूजा ने पौधों की सुरक्षा के बारे में जानकारी दी। डॉ. एबी राय ने पौधो के जड़ों में लगने वाली बीमारी के नियंत्रण पर विचार प्रस्तुत किए। डॉ. सुभाष चंद्रा ने कीट व बीमारी के पूर्वानुमान की जानकारी दी। बंगलुरु के डॉ. ओ पी दत्ता ने बताया विश्व का हर तीसरा व्यक्ति कुपोषण का शिकार है। पोषणयुक्त उत्पादन से ही हर व्यक्ति की सुरक्षा हो सकती है।