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राम के कोप के आगे समुद्र नतमस्तक, पुल बनकर तैयार

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रामनगर। श्रीराम के धनुष उठाते ही समुद्र शरणागत हो जाता है। प्रभु राम से अनुमय- विनय के बाद वह पार उतरने का उपाय सुझाते हैं। फिर शुरू हो जाता है समुद्र पर पुल निर्माण। प्रभुराम शिवलिंग की स्थापना कर पूजन अर्चन करते हैं। नल- नील समेत तमाम वीर वानरों की मदद से पुल बन कर तैयार हो जाता है। वानरी सेना सिंधु पार होकर लंका पर चढ़ाई में जुट गई। उधर, रावण को खबर लगते ही उसने भी राम से युद्ध की रणनीति तैयार करनी शुरू कर दी है ।
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बीसवें दिन रविवार को रघुवीर का सेना सहित सिंधु तट प्रयाण, विभीषण मिलन, सेतु- निर्माण, शिव स्थापना की लीला का आर्कषक मंचन किया गया। लंका क्षेत्र में लीलाओं का मंचन श्रद्धालुओं को भाव विभोर कर गया ।
माता जानकी के अशोक वाटिका में होने की जानकारी पा कर सुग्रीव वानर राज की अगुवाई में भगवान राम की जय जयकार करती वानर सेना प्रस्थान करती है। समुद्र तट पर सभी पहुंचते हैं। उधर, विभीषण रावण से कहता है कि राम को सीता जी को वापस कर दीजिए। इससे आप का बुरा नहीं होगा। रावण विभीषण से कहता है कि मूर्ख, तेरी मौत नजदीक है। यह कहकर रावण विभीषण को लात मारकर लंका से निकाल देता है। तब विभीषण रथ पर बैठ कर श्रीराम के पास आता है। श्रीराम समुद्र की अराधना कर रहे हैं। तीन दिन तक अनुमय -विनय के बाद भी जब समुद्र रास्ता नहीं देता तो भगवान राम क्रोधित हो कर धनुष उठाते हैं। उन्होंने उत्तर दिशा मे बाण चला दिया । समुद्र श्रीराम को प्रणाम कर चला जाता है। नल -नील जो भी पत्थर समुद्र में डालते हैं वो सब तैरता रहता है । इस तरह सेतु निर्माण कर सेना पार उतरने के लिए तैयारी करती है। वहां भगवान राम शिवजी की स्थापना में लग जाते हैं। प्राण प्रतिष्ठा के बाद पूजन - अर्चन करते हैं। श्रीराम, लक्ष्मण के पीछे हनुमान जी खड़े होते हैं। अन्य वानर भगवान राम सुरक्षा में लगे रहते हैं। शिव स्थापना के बाद जब प्रभु राम शंकर जी की आरती अपने हाथों से करते हैं, तो चारो तरफ हर- हर महादेव का उद्घोष होने लगता है।
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