वाराणसी। आश्विन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा गुरुवार को पितृपक्ष आरंभ होते ही काशी में पूर्वजों के प्रति तर्पण-अर्पण, श्राद्ध के लिए वंशजों की भीड़ उमड़ पड़ी। पहले दिन शिव गया के रूप में काशी के गंगा तटों, कुंडों पर हजारों की तादाद में लोगों ने पिंडदान कर पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता अर्पित की। अकाल मौत के बाद भटकती आत्माओं की शांति के लिए पिशाचमोचन कुंड (बिमल तीर्थ) पर त्रिपिंडी श्राद्ध भी खूब हुए। यहां त्रिपिंडी श्राद्ध के लिए कुंड के घाटों की सीढ़ियों पर कहीं जगह नहीं बची। मणिकर्णिका तीर्थ के अलावा दशाश्वमेध घाट और अहिल्याबाई घाट पर कतारबद्ध होकर लोगों ने पिंडदान किया। यह सिलसिला 14 दिन तक चलेगा।
पिशाचमोचन कुंड पर आकाल मृत्यु के चलते परेशान आत्माओं की शांति के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध हुए। सुबह पिशाचमोचन पर इस कदर भीड़ उमड़ी कि मलदहिया से लोहामंडी, कबाड़मंडी होते हुए कुंड पर आने वाला रास्ता जाम हो गया। ब्रम्हबाबा घाट के कर्मकांडी पंडा मुन्ना लाल पांडेय ने बताया कि अनादि काल से बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी के इस कुंड पर अशांत आत्माओं को तृप्त करने के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध की परंपरा रही है। मान्यता है कि पितरों को प्रेत बाधा और व्याधियों से मुक्ति मिल जाती है। इसे शिवगया भी कहते हैं। इसी कामना से लोग यहां त्रिपिंडी श्राद्ध के लिए आते हैं। तीन मिट्टी के कलशों की स्थापना कर काले, लाल और सफेद झंडों के प्रतीक लगाकर श्राद्ध कराए गए। उधर, मणिकर्णिका तीर्थ पर नेपाली लाल मोहरिया पंडा पं. रविशंकर द्विवेदी ने नेपाल से आए सैकड़ों वंशजों के लिए पिंडदान कराया। राजघाट के अलावा दशाश्वमेध घाट, राजाघाट, मानसरोवर घाट पर समूहबद्ध होकर लोगों ने पिंडदान किया।