वाराणसी। काशी के ज्ञान के विविध पक्षों से सभी को परिचित कराने हेतु क्षेत्रीय पुरातत्व इकाई व इंटेक वाराणसी के संयुक्त तत्वावधान में दुर्गाकुंड स्थित पिलग्रिम पब्लिशिंग में काशी विमर्श व्याख्यान शृंखला का आयोजन किया गया। जिसके अन्तर्गत ‘काशी में संस्कृत भाषा’ पर आचार्य विद्यानंद मुद्गल ने अपना व्याख्यान प्रस्तुत किया। आचार्य मुद्गल ने बताया कि संस्कृत भाषा आर्य संस्कृति के मंत्रों की भाषा है। जो सनातन संस्कृति की वाहक भाषा है। काशी की दो परंपरा है, वैदिक और लोक परंपरा। संस्कृत के अध्ययन की परंपरा काशी में सर्व प्राचीन है। काशी में अधिक से अधिक शिष्यों को पढ़ाने की इच्छा यहां के गुरुओं में थी।
कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर तथा दीप जलाकर किया गया। अतिथियों का स्वागत रामानंद तिवारी, धन्यवाद क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी डॉ. सुभाष चंद्र यादव ने दिया। संचालन ज्योति सिंह का रहा। इससे पूर्व श्रीलंका के निवासी डॉ. डब्ल्यू विवियन द्वारा अंग्रेजी में अनुवादित भर्तृहरि शतक का लोकार्पण किया गया। इस अवसर पर अशोक कपूर, हरिराम द्विवेदी, अन्नपूर्णा शुक्ला, डॉ. अवधेश दीक्षित, डॉ. प्रेमनारायण, डॉ. सुरेश नायर, जयदीप, बलराम, राकेश, डॉ. विकास सिंह आदि लोग उपस्थित थे।
संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए आगे आएं
वाराणसी। बीएचयू रुइया छात्रावास स्थित संस्कृत ब्लॉक में चल रहे दस दिवसीय संस्कृत संभाषण शिविर के समापन समारोह में प्रतिभागियों से संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए आगे आने का आह्वान किया गया। बतौर मुख्य अतिथि तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. रमाशंकर दूबे ने कहा कि संस्कृत भाषा में अधिक ज्ञान-विज्ञान हैं जिसे जानने एवं समझने के लिए संस्कृत भाषा का ज्ञान अपेक्षित है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रो. चंद्रमा पांडेय ने संस्कृत की शिक्षा संस्कृत भाषा के माध्यम से ही करने पर बल दिया। शिविर प्रशिक्षक संस्कृत भारती के संगठन मंत्री डॉ. संजीव राय ने कहा कि कोई भी भाषा संभाषण में ही आती है, बस इसके अभ्यास की जरूरत होती है। इस दौरान छात्रावास के प्रशासनिक संरक्षक डॉ. उपेंद्र कुमार त्रिपाठी, धीरज कुमार, अवनीश कुमार पाठक आदि मौजूद रहे।