वाराणसी। अगर आप ने हाल ही में खुद या परिवार के किसी सदस्य ने हड्डी से जुड़ी बीमारियों में इंप्लांट्स कराया है तो सावधान हो जाएं। इंप्लांट्स चीन निर्मित घटिया माल भी हो सकते हैं। दरअसल, ज्यादा फायदे के लिए कुछ फर्में चीन से घटिया उपकरण खरीद कर उसे स्वेदशी के नाम पर आर्थो सर्जन व संबंधित अस्पतालों को उपलब्ध करा रही हैं। फर्मे इन इंप्लांट्स पर खरीद का तीन से चार गुना फायदा चिकित्सकों और हॉस्पिटल को दे रही हैं। घटिया उपकरणों के इंप्लांट्स से मरीजों में इंफेक्शन का खतरा बढ़ जाता है।
शिकायत के आधार पर शुक्रवार को केंद्रीय जीएसटी की टीम ने जांच-पड़ताल की तो पता चला कि ज्यादा फायदे के चक्कर में मिलते-जुलते नाम की कई फर्में बनाई गई। ये फर्में चीन से दिल्ली माल मंगा रहे थे। दिल्ली से जिलों को सप्लाई दी जा रही थी। इतना ही नहीं, फर्जी फर्मों की साइट को मल्टीनेशनल कंपनियों के समतुल्य आकर्षक बनाया गया है। चिकित्सक या अस्पताल में कूल्हे, घुटने जैसे इंप्लांट्स कराने पहुंच रहे लोगों को उच्च क्वालिटी का उपकरण बताकर दोयम दर्जे का इंप्लांट्स लगाया जा रहा था। अस्पतालों में प्रबंधन की जानकारी के बगैर घटिया इंप्लांट्स का इस्तेमाल सर्जरी में भी किया गया।
हेरिटेज प्रबंधन की नाक के नीचे चल रहा था खेल
छापामार टीम के मुताबिक हेरिटज अस्पताल के चिकित्सक डॉ. आशुतोष विक्रम फर्जी फर्मों के बने इंप्लांट्स लगाने के लिए मरीजों और उनके तीमारदारों को प्रेरित करते थे। डॉक्टर के चैंबर में जानकारी और चीन निर्मित उपकरण दिए जाने के बावजूद प्रबंधन भनक नहीं लगी। मरीज के अस्पताल में ऑपरेशन के लिए पहुंचने पर बताया जाता कि इंप्लांट्स उपकरण मरीज बाहर से लेकर आया है। रेट भी बेहद कम बताया जाता। इधर मरीज के परिजनों से भी पैसे लिए जाते और उधर फर्म से भी पैसे ऐंठे जाते। मामले में हेरिटेज के वाइस चेयरमैन डॉ. सिद्धार्थ राय ने बताया कि डॉ. आशुतोष चैंबर में क्या करते थे, इसकी जांच कराई जाएगी। वहीं डॉ. आशुतोष ने कुछ भी बोलने से मना कर दिया।
रेट और एक्सपायरी डेट भी फर्में करती थी निर्धारित
इंप्लांट्स के पैकेट पर रेट प्रिंट नहीं होता था। फर्में या चिकित्सक और हॉस्पिटल खुद रेट निर्धारित करती थी। पराकाष्ठा यह भी थी कि मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपायरी डेट का बाक्स भी रिक्त था। चिकित्सक और हॉस्पिटल इसे खुद ही भर लेता था।