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‘बाबुल मोरा नइहर छूटो जाए...’

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वाराणसी। बनारस घराने की ठुमरी की मल्लिका पद्मविभूषण गिरिजा देवी का साथ अंत तक सुरों से नहीं छूटा। अर्थी सजी तो उनके आंगन में ठुमरी की बंदिश गूंजने लगी। वाजिद अली शाह रचित उनकी प्रिय ठुमरी- ‘बाबुल मोरा नइहर छूटो जाए...’ के बोल पर अर्थी को कंधा दिया गया। शवयात्रा निकलने तक ठुमरी की कशिश उनके साथ-साथ चलती रही।
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अंतिम विदाई बेला में भी अप्पा जी की संगीत साधना सुरों के जरिए फलित हुई। अर्थी सजते ही पद्मश्री मलिनी अवस्थी और सुनंदा शर्मा ने ठुमरी की बंदिश पर आलाप लेना शुरू किया। राग मिश्र भैरवी में -बाबुल मोरा नइहर छूटो जाए.. की मालिनी ने अवतारणा की। साथ दिया सुनंदा ने। अप्पा जी के साथ हारमोनियम पर अंत तक संगत करते रहे पं. धर्मनाथ मिश्र ने अंतरा गाकर ठुमरी के सुरमयी अंदाज को और गाढ़ा बना दिया। उस वक्त हर किसी के आंखों में अप्पा जी की विदाई के आंसू छलक रहे थे लेकिन सुरों की लड़ियां थीं कि टूटने का नाम नहीं ले रही थीं।
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