बाबतपुर। लाल बहादुर शास्त्री अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट की तस्वीर बदलने वाली है। एयरपोर्ट के तीसरे चरण के विस्तार की रूपरेखा तैयार कर अथॉरिटी ने भूमि अधिग्रहण के लिए प्रस्ताव राज्य सरकार को भेज दिया है। प्रस्ताव के साथ आवश्यक भूमि के अधिग्रहण से संबंधित कागजात और मैप आदि भी भेजे गए हैं। प्रस्ताव को मंजूरी मिली तो आने वाले समय में एयरपोर्ट का नक्शा पूरी तरह बदल जाएगा। वहीं, भूमि अधिग्रहण को लेकर आसपास के गांवों के बाशिंदों की नींद उड़ने लगी है।
एयरपोर्ट विस्तार की जानकारी होने के बाद हवाईअड्डे के आसपास रहने वाले गांवों में भूमि अधिग्रहण को लेकर अटकलबाजियां जोरों पर हैं। चट्टी चौराहों पर सुबह-शाम बस एक ही चर्चा हो रही है कि किसकी जमीन इसकी जद में आएगी और किसका घर। अपनी पुश्तैनी जमीन और घर जाने का गम अभी से किसानों के चेहरे पर नजर आने लगा है। भले ही उन्हें अच्छा मुआवजा मिले लेकिन अधिकतर किसान नहीं चाहते कि उन्हें किसी भी तरह उनकी पुश्तैनी जमीन और घर से बेदखल होना पड़े।
एयरपोर्ट अथॉरिटी के अनुसार इस समय हवाईअड्डा 746 एकड़ में फैला है। वर्तमान में यहां से देश-विदेश के लिए कई विमान सेवाएं संचालित होती हैं। सैलानियों और यात्रियों के बढ़ते दबाव के मद्देनजर आने वाले समय में विमानों की संख्या और बढ़ाई जानी है। ऐसे में उस अनुरूप रनवे, एप्रन तथा अन्य बुनियादी सुविधाओं को भी बढ़ाना पड़ेगा। एयरपोर्ट अथॉरिटी को एयरपोर्ट के पूर्व और दक्षिण तरफ 360 एकड़ भूमि की आवश्यकता है, जहां एटीसी, टेक्निकल ब्लॉक, पार्किंग सहित कई अन्य कार्यालय होंगे।
कर्मी गांव के रहने वाले नंदलाल पटेल की तीन बीघा जमीन विस्तार क्षेत्र में आ रही है। इनका कहना है कि भले सरकार जमीन का अधिक पैसा दे पर जो सुविधाएं यहां हैं वह उन्हें कहीं और नहीं मिलेगी। यहां से बाबतपुर रेलवे स्टेशन, रोडवेज बसअड्डा सब नजदीक है। सगुनहा गांव के निवासी शिवकरन पटेल का कहना है कि किसी का पुश्तैनी मकान, जमीन चली जाए तो उससे बड़ा कष्ट क्या हो सकता है। भले ही सरकार मुआवजा दे पर पुरखों की जमीन तो वापस नही मिल पाएगी। सिसवा गांव की सुशीला यादव, राज कुमारी, शारदा देवी, हीरा देवी का कहना है कि जमीन छिन जाने के बाद दूसरी जगह बसने के लिए जगह तलाशनी होगी। वहां व्यवस्थित होने में न जाने कितना समय लगेगा। अगर अपना घर छूटता है तो दर्द बहुत होता है। सगुनहा के सियाराम यादव ने कहा कि अगर हम लोगों की जमीन एयरपोर्ट में जाएगी तो कोई दिक्कत नहीं है, बशर्ते सरकार पर्याप्त मुआवजा दे और जो किसान बेदखल हो रहे हैं उनके रोजी-रोजगार का प्रबंध करे। पैसा रहेगा तो कहीं भी जमीन खरीदकर बस सकते हैं।