वाराणसी। चंद्र टरे सूरज टरे, टरे जगत व्यवहार। पै दृढ़व्रत हरिश्चंद्र को, टरे न सत्य विचार... सत्य की चर्चा जब भी होगी महाराजा हरिश्चंद्र का नाम जरूर लिया जाएगा। सपने में भी वचन देकर उसका उन्होंने निर्वहन किया। सत्य की रक्षा के लिए उन्होंने हर तरह की परेशानियों को झेला। भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा लिखित नाटक सत्य हरिश्चंद्र का नौटंकी शैली में मंचन हर किसी केे मन को छू गया। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के छात्रों ने भावपूर्ण प्रस्तुतियों से दर्शकों की आंखाें को नम कर दिया।
नाटक की शुरुआत इक्ष्वांकु वंश के प्रतापी महाराज राजा हरिश्चंद्र द्वारा यज्ञ से होती है। यज्ञ के प्रभाव से देवताओं का सिंहासन हिलने लगता है और उन्हें भय हो जाता है। देवता विश्वामित्र को राजा हरिश्चंद्र की परीक्षा लेने के लिए भेजते हैं। इसके उपरांत वह सपने में राजा हरिश्चंद्र से उनका धन-वैभव और राज्य दान में मांग लेते हैं। सपने में दिए गए वचन को निभाते हुए राजा हरिश्चंद्र पत्नी तारामति और पुत्र रोहिताश्व के साथ काशी आते हैं। धन क माने के लिए वह स्वयं को डोमराजा को बेच देते हैं।
एक रात उनकी पत्नी उनके पुत्र की मृत देह लेकर पहुंचती है और वह उससे भी कर की मांग करते हैं। यह दृश्य देखकर देवता भी विस्मित रह जाते हैं। कर लेने के बाद जैसे ही वह अपने पुत्र को जल में प्रवाहित करने जाते हैं देवलोक से पुष्प वर्षा होने लगती है। इसके साथ ही सभी देव राजा हरिश्चंद्र को आशीर्वाद देकर सारा वैभव लौटा देते हैं। इसके साथ ही नाटक का पर्दा गिर जाता है। निर्देशक पं. रामदयाल शर्मा रहे। कलाकारों में निखिल ठाकुर, पूजा सेन, रवि कुमार, प्रवीण पुनीत सिंह, नैंसी सेठ, शिल्पी सिंह, कीर्ति, साजिया, अंकित व अभिषेक रहे। इस दौरान जिलाधिकारी सुरेंद्र सिंह व सीडीओ गौरांग राठी भी मौजूद रहे।