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सिकुड़ती गंगा में घट रहा पानी, खतरे में पड़ रही है जिंदगानी

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वाराणसी। जीवनदायिनी और मोक्षदायिनी गंगा पर काशी में ही संकट है। सिकुड़ती गंगा में तेजी से जलस्तर कम हो रहा है और रेत के मैदान उभर रहे हैं। शहर के नालों की रोकथाम नहीं होने से प्रदूषण का स्तर भी खतरनाक स्तर तक पहुंच चुका है। काशी से लेकर दिल्ली तक निर्मल और अविरल गंगा के प्रयास किए जा रहे हैं, मगर काशीवासियों की ओर से मजबूत पहल नहीं है।
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वाराणसी में 58.6 से 58.8 मीटर तक पानी गंगा में रहता था, मगर अब घटकर 58.45 मीटर रह गया है। पानी में वेग कम होने से बायोलाजिकल आक्सीजन डिमांड बढ़ता जा रहा है। घाट के किनारे कई स्थानों पर बीओडी 16 से 21 मिलीग्राम प्रति लीटर है। इससे जल संबंधी बीमारियां तेजी से फैलने की आशंका भी बढ़ती जा रही है। हालत यह है कि कई घाटों से अब गंगा दूर होती जा रही हैं। नदी विज्ञानी प्रो. बी.डी त्रिपाठी के अनुसार गंगाजल में आक्सीजन घुलने की क्षमता 10 से 12 मिलीग्राम प्रति लीटर है। अन्य नदियों में आक्सीजन रखने की क्षमता 8 मिली ग्राम प्रति लीटर से अधिक नहीं है। खास यह है कि गंगाजल में घुलित आक्सीजन सैकड़ों साल तक रह सकता है क्योंकि इसके जल में कार्बनिक, अकार्बनिक और जैविक पदार्थ आपस में प्रतिक्रिया नहीं करते।
गंगा अन्वेषण केंद्र के समन्वयक प्रो. यूके चौधरी कहते हैं कि बनारस में गंगाजल में आक्सीजन की मात्रा विलुप्त हो रही है। पानी घटने और नदी के सिकुड़ने का अर्थ यह है कि गंगा के अस्तित्व पर संकट है। टीडीएस का बढ़ने और अन्य नदी नालों के कारण गंगाजल की गुणवत्ता प्रभावित कर रही है। गंगा में घुलित आक्सीजन की मात्रा 12 मिलीग्राम प्रति लीटर और बीओडी 1 मिलीग्राम प्रति लीटर से कम नहीं होनी चाहिए। फ ीकल कोलिफ ार्म 500 प्रति 100 मिली लीटर से अधिक नहीं होनी चाहिए।
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