वाराणसी। पैदा काबे में हो, मस्जिद में शहादत पाए। अली सा कोई बंदा हो तो दुनिया सामने लाए...। यह संदेश शुक्रवार को शहर की शिया मस्जिदों में गूंज उठा। पैगंबर हजरत अली की शहादत के 14 सौ साल पूरे होने पर काशी में भी तीन दिनों तक गम मनाया जा रहा है। शुक्रवार की शाम को इफ्तार के बाद शहर की 32 शिया मस्जिदों में शहादत के सिलसिले से मजलिस का आयोजन किया गया। घरों में भी हजरत अली के नाम पर ख्वातिन ने नौहा मातम किया।
शुक्रवार को मशहूर शायर स्व. अब्बास बेग मेहसर के चौक स्थित आवास पर कदीमी मजलिस का आयोजन हुआ। अब्बास मुर्तजा शमसी के संयोजन में मौलाना मो. अकील हुसैनी और मौलाना डॉ. काजिम मेंहदी उरूज जौनपुर ने मजलिसों को खिताब किया। मजलिस में लियाकत अली ने सोजखानी से मजलिस का आगाज किया। मजलिस के बाद इमाम का ताबूत उठाया गया। अंजुमन हैदरी चौक ने नौहा मातम किया। शिया जामा मस्जिद के प्रवक्ता हाजी फरमान हैदर ने बताया कि पहला जुलूस 25 मई को सुबह चार बजे मस्जिद मीर नादेअली से अंजुमन हैदरी चौक के जेरे इंतजाम उठाया जाएगा। शहादत के सिलसिले से तीन दिनों तक अंजुमन इमामिया द्वारा ताबूत उठाया जाएगा। 26 मई को दरगाहे फातमान में शब्बेदारी का आयोजन होगा और भोर में ताबूत उठाया जाएगा। शिवपुर में अंजुमन पंजतनी के जेरे इंतजाम ताबूत उठाया जाएगा। हजरत अली की शहादत 21 रमजान 40 हिजरी कुफे में हुई थी। उनका रौजा इराक के नजफ में है। उनके दोनों बेटे हसन और हुसैन ने भी अपनी शहादत से इंसानियत को बुलंद किया। शहरे बनारस में हजरत अली का मुख्य रौजा लल्लापुरा दरगाहे फातमान में स्थित है।