फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

रागों-बंदिशों के सुरीले सफर के 1000 दिन

विज्ञापन
विज्ञापन
वाराणसी। वह सुबह काशी के लिए कुछ खास थी। सदियों से गंगा की लहरों का राग सुनता अस्सी घाट दिन चढ़ने से पहले ही गुलजार हो चला था। पूरब से निकलते सूरज की स्वर्णिम किरणें गंगा की मौजों पर तैरने लगी थीं। हवा में गंगा तट की माटी की सोंधी सुगंध के साथ ही यज्ञ की समिधा की खुशबू घुलने लगी थी। करीब तीन साल पहले 24 नवंबर, 2014 को ऐसी ही खुशनुमा सुबह के साथ पहली बार सजी थी ‘सुबह-ए-बनारस’ की महफिल। रागों-बंदिशों के इस अनूठे सफर की शुरुआत का मकसद था घाटों पर शास्त्रीय गायन और योग के जरिए पर्यटकों के भीतर बनारस के अहसास को घोलना। उन्हें काशी की संगीत परंपरा से जोड़ना और गंगा की इठलाती लहरों के साथ सुर लहरियों के संगम का अनूठी बानगी पेश करना। 19 अगस्त को जब यह सफर अपने शानदार-यादगार 1000 दिन पूरे कर रहा है तो लगता है कि काफी हद तक यह कोशिश रंग ला रही है।
विज्ञापन

‘सुबह-ए-बनारस’ अपने सुरीले सफर के एक हजार दिन उसी अस्सी घाट पर पूरे करने जा रहा है जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फावड़ा चलाकर स्वच्छता अभियान की शुरुआत की थी। इसके आयोजन का मसौदा क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र ने प्रदेश के संस्कृति विभाग को 2012 में भेजा था लेकिन नरेंद्र मोदी के बनारस से सांसद चुने जाने और प्रधानमंत्री बनने के बाद अस्सी घाट पर सफाई का अभियान छेड़ने के बाद इसे मंजूरी मिल पाई।
अस्सी घाट के नए रंग-रूप में आने के बाद सूरज की पहली किरण के साथ रागों-बंदिशों की सजने वाली इस महफिल का आयोजन जिला प्रशासन और सांस्कृतिक विभाग की ओर से किया जा रहा है। इस कार्यक्रम से शास्त्रीय गायन और आरती के साथ बनारस की टूट चुकी परंपरा को फिर से शुरू किया गया है। गंगा तट के जिन घाटों पर कभी उस्ताद बिस्मिल्लाह खां, पं. महादेव मिश्र जैसे कलाकार सुबह-सुबह रियाज करते थे, इस कार्यक्रम के जरिए उसी स्वर्णिम अतीत को दोहराने की कोशिश लगातार जारी है।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें