सोनभद्र (अनपरा)। एशिया के विशालतम जलाशयों में एक रिहंद डैम में राख एवं अन्य औद्योगिक अवशिष्टों के बढ़ते भराव का सीधा असर शाकाहारी मछलियों के प्रजनन क्षमता पर पड़ रहा है। प्राकृतिक रूप से पर्याप्त चारे की उपलब्धता होने के कारण इनका (कतला, रोहू, नयन आदि) उत्पादन काफी हद तक थम सा गया है। इससे इन मछलियों की तादाद जहां तेजी से घट रही है। इससे, इनके मुकाबले मांसाहारी मछलियों की बढ़ती तादाद भी इनके वजूद पर संकट खड़ा करने लगी है।
रोहू, कतला, नयन जैसी प्रमुख देशी शाकाहारी मछलियों के लिए रिहंद जलाशय की पूरे देश में अलग पहचान है। इस प्रजाति की अच्छी मछलियां मिलने के कारण, यहां से ऊर्जांचल परिक्षेत्र के साथ पश्चिम बंगाल के कोलकाता तक इनकी आपूर्ति की जाती है। ..लेकिन हाल के कुछ वर्षों में जिस तरह से रिहंद का पारिस्थितिकी संतुलन बिगड़ा है, उससे शाकाहारी प्रजाति के मछलियों की बढ़वार थमने लगी है। बताते हैं कि पहले जहां जाल में फंसने वाली मछलियों में शाकाहारी मछलियों की बहुलता होती थी। वहीं अब इसकी जगह मांसाहारी मछलियों (सिलन, टेंगर, पहिन, सौर, मोय आदि) ने ले ली है। कई बार मारी गई मछलियों की खेप में शाकाहारी वर्ग के प्रजातियों की संख्या गिनी-चुनी निकलती है। अब इन मछलियों से निकलती अजीब गंध भी परेशानी का कारण बनने लगी है। शक्तिनगर एरिया का प्रभार देखने वाले मत्स्य विकास अधिकारी प्रमोद कुमार शुक्ला और तुर्रा परिक्षेत्र का प्रभार देख रहे मत्स्य विकास अधिकारी रामदवर भी इसको लेकर चिंता जताते हैं। कहते हैं कि बड़े जलाशयों में शाकहारी मछलियों की बढ़वार (प्रजनन में वृद्धि) के लिए प्राकृतिक रूप से चारे (मछलियों के भोजन) की पर्याप्त उपलब्धता होनी चाहिए। क्योंकि बड़े जलाशयों में तालाबों की तरह अलग से चारा उपलब्ध करा पाना मुश्किल है। उन्होंने माना कि रिहंद में औद्योगिक अवशिष्टों के भराव के चलते जलीय पर्यावरण का संतुलन बिगड़ा है और इसका सीधा असर मछलियों के लिए चारे की उपलब्धता पर पड़ा है। वहीं मांसाहारी मछलियां शाकाहारी मछलियों के बीजों को खा जाती है, जिससे शाकाहारी प्रजाति के मछलियों की बढ़वार और भी प्रभावित होने लगी है।