वाराणसी। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट में बनारस को भी सबसे प्रदूषित शहरों में शामिल किया गया है, इसके प्रमुख कारणों में से एक प्लास्टिक कचरा भी है। शहर से हर दिन निकलने वाले कूड़े में 10 से 15 प्रतिशत तक पॉलिथीन होती है। इससे भूमिगत जल स्तर सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहा है। जमीन की पानी अवशोषित करने की क्षमता नष्ट होती जा रही है। लिहाजा पहले से ही जल संकट से जूझ रहे शहर की समस्या और बढ़ती जा रही है।
बीएचयू के पर्यावरण एवं धारणीय विकास संस्थान के असिस्टेंट प्रोफेसर राजीव सिंह के अनुसार, पॉलिथीन जब जमीन में दबती है तो भूमि पानी अवशोषित नहीं कर पाती है। इससे भूमिगत जल स्तर कम होता चला जाता है। जमीन की हवा सोखने की शक्ति भी समाप्त हो जाती है। लाभप्रद बैक्टीरिया मर जाते हैं। जो बचते हैं उनकी क्षमता कम हो जाती है, इससे उर्वरा शक्ति भी नष्ट हो जाती है।
नगर निगम के आंकड़ों के अनुसार, शहर में रोजना 600 मीट्रिक टन कूड़ा उठाया जाता है। निस्तारण से पहले एकत्रित कूड़े को अलग-अलग भागों में बांटा जाता है। आश्चर्य की बात यह है कि इसमें पॉलीथिन की मात्रा 10 से 15 प्रतिशत तक होती है।
500 किलो हर दिन खपत
बाजार के सूत्रों के अनुसार, जिले भर में रोजाना पांच सौ किलो से ज्यादा पॉलिथीन की खपत होती है। नगर निगम के अफसर भले ही पॉलीथिन के खिलाफ समय-समय पर अभियान चलाने का दावा करते हों, लेकिन पॉलिथीन का प्रयोग धड़ल्ले से किया जा रहा है।
हवा पर भी असर, गंदगी का बनी कारण
जमीन ही नहीं, पॉलिथीन से हवा भी प्रदूषित हो रही है। क्रांति फाउंडेशन के ई. राहुल सिंह के अनुसार, जलाए बिना भी पॉलिथीन खतरनाक गैसें जैसे बेंजीन, विनायल और इथनॉल ऑक्साइड का उत्सर्जन कर हवा को विषाक्त बनाती है। पॉलिथीन गंदगी का भी प्रमुख कारण है। इससे सीवरेज सिस्टम भी प्रभावित हो रहा है। पॉलिथीन से नालियां चोक हो रही हैं, जिससे गंदा पानी सड़कों पर बहता रहता है।
रुक जाता है शिशु का विकास
चिकित्सकों के अनुसार, प्लास्टिक के ज्यादा संपर्क में रहने से खून में थेलेट्स की मात्रा बढ़ जाती है। इससे गर्भस्थ शिशु का विकास रुक जाता है। सीएमओ डॉ. वीबी सिंह के अनुसार, पॉलिथीन के जलने से कार्बन डाई ऑक्साइड, कार्बन मोनो ऑक्साइड सहित अन्य विषैली गैसें उत्सर्जित होती हैं। इससे सांस व त्वचा संबंधी बीमारियों की आशंका बढ़ जाती है। इनमें खांसी, सांस लेने में दिक्कत, आंखों में जलन, चक्कर आना, मांसपेशियों का शिथिल होना और हृदय रोग प्रमुख हैं। लगातार प्लास्टिक की बोतल में पानी या चाय पीने वालों में कैंसर का खतरा बढ़ जाता है।
यह हो सकती है कार्रवाई
अधिवक्ता पी सिंह के अनुसार, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम की धारा 19 में प्रतिबंध का उल्लंघन करने पर शिकायत और न्यायालय द्वारा स्वयं संज्ञान लेने का प्रावधान है। अधिनियम की धारा 16 के तहत किसी कंपनी द्वारा पाबंदी का उल्लंघन कर प्लास्टिक कैरी बैग बनाने और व्यापार करने पर कंपनी के प्रबंधक, निदेशक और सचिव को दोषी माना जाएगा। धारा 17 में सरकार के किसी विभाग द्वारा पाबंदी का उल्लंघन करने उस विभाग के प्रधान के खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान है।
प्रतिबंध पर कब और क्या हुआ
पर्यावरण विभाग की ओर से 22 दिसंबर 2015 में जारी अधिसूचना में सभी तरह की पॉलिथीन और कैरी बैग के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने की बात कही गई। इसी क्रम में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने 50 माइक्रॉन से कम मोटी पॉलिथीन को पर्यावरण के लिए खतरनाक बताया। 15 जुलाई 2018 को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश में 50 माइक्रॉन से कम की पॉलीथिन पर प्रतिबंध लगाया। प्रदेश में पॉलिथीन के प्रयोग पर प्रतिबंध की कवायद वर्ष 2000 में शुरू हुई थी, लेकिन अलग-अलग कानूनों के चलते इस पर अमल नहीं हो सका था। वहीं, नगर विकास विभाग ने वर्ष 2000 में उत्तर प्रदेश प्लास्टिक और अन्य जीव अनाशित कूड़ा-कचरा अधिनियम लागू किया था। इसके तहत 20 माइक्रॉन से कम की पॉलिथीन के उपयोग पर प्रतिबंध है।
आदत बदले, घर से झोला लेकर निकलें
पॉलिथीन पर रोक तभी लग सकती है, जब हम खुद इसे अपनी आदत में बदलाव करेंगे। इसकी शुरुआत हमें अपने घर से करनी होगी। जब हम पॉलिथीन के बदले कपड़े के थैले का उपयोग करना शुरू करेंगे तो हालात भी काफी बदल जाएंगे।