वाराणसी। होली का माहौल ऐसा है कि खुशियां एक साथ उठे और एक-दूसरे के गले लग जाये, तब लगता है की मानवता सब के संग हो ली, सबने मस्ती की धुन गा ली और भली लगनी लगे गाली। सबके रंग खुशी हो ली, मन की दुनिया निर्मल हो ली, भावनाएं चैतन्य हो ली। आगामी वर्ष के लिए सचेत हो गएं। योजनाओं के चयन से चुनी गयी अर्थात चैता चयिता चैती गुनगुनाने लगी तो समझिए होली मुस्कराने लगी।
पद्मश्री राजेश्वर आचार्य की शिष्या डॉ. शिवानी आचार्य का कहना है कि अनास्था द्वेष और ढोंग को निश्चित रूप से अग्निन्याय के द्वारा जला देना और भागवत भावी सत्यनिष्ठा रूपी प्रहलाद को बचा लेना होली में अंतर्निहित है। वर्ष भर हिरण्य (स्वर्ण ) कश्यप अर्थात कछुवा जैसी लुकाछिपी में कपट मन सारी दमित भावना को छली गली से निकाल कर भली भावना के भले उमंग रंग से सभी संग को प्रसन्नता के रंग से रंग दे। उन्होंने कहा मुझे इस वर्ष होली के रंगों से भरी रंगभरी एकादशी के पावन पर्व पर बाबा विश्वनाथ के दरबार में शिव और शिवा की होरी को प्रस्तुत करने का सौभाग्य मिला। वे बोलीं, खेले शिवा शिव होरी सप्तऋषि सतरंग जुटावे गंगा दीनी घोरी। विश्वनाथ दरबार के लिए समर्पित मेरे गुरुदेव पद्मश्री प्रो. राजेश्वर आचार्य प्रभावरंग की रचना हैं जिसमें वर्णित है कि शिव शिवा की होरी के लिए सप्तऋषि सात रंग जुटाते और उन रंगों को घोलने के लिए गौमुख से गंगा सागर तक प्रवाहमान सम्पूर्ण गंगा जी उन रंगों को घोलने के लिए उत्साहित हो जाती हैं। तब जा कर खेलते हैं शिव और शिवा होली और काशी की होली शिव और शिवा की होली को गाकर ही संपूर्ण होती है। शिवानी आगे कहती हैं कि काशी की होली में जिस रस की अनुभूति होती है, वह सभी आदि व्याधियों की औषधि है। इसीलिए कवि प्रभावरंग कहते हैं कि अस फागुन रस गुणकारी सखी अस फागुन रस गुणकारी, कारी भी गोरी गोरी भी कारी मैल मिटे बलिहारी सखी। शिवानी गुनगुनाते हुए कहती हैं कि काशी में रास रंग से भरी कृष्णभक्ति में डूबी होली गाये बिना काशीवासियों को चैन नहीं मिलता।
डॉ. शिवानी आचार्य अग्रसेन महिला पीजी कालेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। संगीत की आरंभिक शिक्षा डॉ. सीमा वर्मा तथा वर्तमान में पद्मश्री प्रो. राजेश्वर आचार्य जी से शिक्षा प्राप्त कर रही हैं।