वाराणसी। सुरक्षा उपकरणों से लैस कर यदि दोनों मजदूरों को काली माता मंदिर चौराहा के समीप मैनहोल में उतारा जाता तो शायद उनकी जान न जाती। हालांकि सीवर संबंधी काम कराने वाली कार्यदायी संस्थाएं सुरक्षा मानकों को लेकर कभी गंभीरता नहीं बरततीं। कार्यदायी संस्थाओं को सिर्फ अपना काम जल्द से जल्द पूरा कराना होता है और इसी जल्दबाजी में अकसर हादसा हो जाता है।
जानकारों के अनुसार सीवर लाइन में 80 प्रतिशत मीथेन गैस के अलावा कार्बन डाई आक्साइड, सल्फर डाई आक्साइड और हाइड्रोजन डाई आक्साइड जैसी जहरीली गैसें होती हैं। ऐसे में मजदूरों को ऑक्सीजन मास्क, सेफ्टी सूट, गम बूट, हेलमेट, दस्ताना और टार्च से लैस कर उनकी कमर में सुरक्षा रस्सी बांध कर मैनहोल या सीवर लाइन में उतारना चाहिए। चैंबर का ढक्कन दो-ढाई घंटे पहले खोल देना चाहिए, जिससे गैस निकल जाए और इसके बाद उसमें चार-पांच बाल्टी पानी डालना चाहिए। इसके साथ ही मौके पर सेफ्टी इंजीनियर मौजूद रहना चाहिए। हालांकि होता इसके ठीक उलटा है और मौके पर सिर्फ ठेकेदार व उसके मजदूर रहते हैं। हादसा होते ही सभी भाग खड़े होते हैं और समय से मदद न मिलने के कारण मजदूर की जान बचाना मुश्किल हो जाता है।
काली माता मंदिर चौराहा के समीप 20 फीट से ज्यादा गहरे मैनहोल की सफाई का काम एलएंडटी कंपनी द्वारा कराया जा रहा था। बताया जाता है कि यह काम स्थानीय लेबर, ठेकेदार द्वारा कराया जा रहा था। भोर में 3:30 बजे के लगभग मैनहोल मेें मलबा आदि की सफाई के लिए मजदूर राजेश पासवान, चंदन, सुमेश और मन्नी लोहे की सीढ़ी से नीचे उतरे। कुछ ही देर में सुमेश और मन्नी ऊपर आए और बताए कि भारी मात्रा में मलबा जमा है और बगल की पाइप से पानी लीकेज हो रहा है। इस पर ऊपर से राजेश और चंदन को आवाज दी गई लेकिन अंदर से कोई जवाब नहीं आया। आरोप है कि राजेश और चंदन की आवाज न आने पर ठेकेदार सहित अन्य जिम्मेदार लोग मौके से भाग खड़े हुए। सूचना पाकर कैंट पुलिस मौके पर पहुंची और एनडीआरएफ की मदद से राहत और बचाव कार्य शुरू कराया गया। इस संबंध में इंस्पेक्टर कैंट ने बताया कि घटना के संबंध में तहरीर मिलने पर मामले में आगे की कार्रवाई की जाएगी