ज्ञान प्रवाह में प्रवाहमान है काशी की थाती
वाराणसी। परिवर्तन प्रकृति का नियम है, लेकिन लाख बदलावों के बावजूद बनारस में अभी बहुत कुछ बचा हुआ है, जिस पर हम गर्व कर सकते हैं। इनमें से एक सामने घाट स्थित गंगा किनारे बना ज्ञान प्रवाह है। अपने नाम के अनुरूप यहां ज्ञान गंगा की अविरलता प्रवाहमान रहती है। दो मंजिले इस भवन में ग्रंथालय, पुस्तकालय स्थापित है, जहां काशी की संस्कृति और परंपरा संरक्षित है।
गंगा तट पर सुरम्य लहरों से संवाद करती कला यहां सिर्फ थाती के तौर पर सहेजकर रखी ही नहीं जाती, पत्थरों-धातुओं पर आकार भी लेती है। चाहे मुगल काल के शिल्प हों या नेवारी चित्रित्र पोथी के बेजोड़ नमूने, यहां ज्ञान के भंडार के रूप में बरबस ध्यान खींच लेते हैं।
- संस्कृति का संवाहक- संस्कृति और परंपरा के संवाहक के रूप में यहां हर वर्ष वैदिक यज्ञ किया जाता है।
- संस्कृत नाटकों का मंचन- एक दौर था जब काशी में संस्कृत नाटकों की एक पूरी शृंखला का मंचन किया जाता था। उसी परंपरा को जीवित रखने के लिए ज्ञान प्रवाह में संस्कृत नाटकों के प्रशिक्षण के साथ उनका मंचन भी कराया जाता है।
- पुस्तकालय- ज्ञान प्रवाह का अपना एक पुस्तकालय भी है, जिसमें करीब 12 हजार से ज्यादा पुस्तकें हैं। धर्म, दर्शन, संस्कृति, इतिहास, भूगोल से लेकर तमाम विषयों पर पुस्तकों का संग्रह मौजूद है।
- कलामंडप- ज्ञान प्रवाह के द्वितीय तल पर स्थित संग्रहालय ‘कला मंडप’ 1999 में स्थापित किया गया। संग्रहालय के सभागार में प्राचीन शैली की मूर्तियाें के साथ अष्टधातु के हाथी, शेर, सूर्य भगवान की प्रतिमाओं के अलावा मुगल शैली के नक्काशीदार बर्तनों, टेराकोटा, धातुओं पर ढलाई, लकड़ी के खिलौने, पत्थरों पर नक्काशी, बीकानेर शौली की कलाओं का विशेष संग्रह है।
शिल्पशाला- इसमें यहीं के कारीगरों से शिल्प का निर्माण करा कर उन्हें संरक्षित किया जाता है।
इतिहास- कलकत्ता निवासी बिमला पोद्दार को काशी में रहने के दौरान उनके मन में आया कि यहां के लिए कुछ किया जाए। उन्होंने विद्वानों और समाज के विशिष्ट जनों से विचार विमर्श कर 1995 में सामनेघाट क्षेत्र में गंगा किराने ज्ञान प्रवाह की नींव डाली।