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चिंतन की नहीं, जीने की भाषा है भोजपुरी

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वाराणसी। अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर गुरुवार को बीएचयू में आयोजित कार्यक्रम में वक्ताओं ने मातृभाषा के संरक्षण का संदेश दिया। भोजपुरी अध्ययन केंद्र में आयोजित विचार गोष्ठी में मुख्य अतिथि बीएचयू सर सुंदरलाल अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक प्रो. विजय नाथ मिश्रा ने कहा कि भोजपुरी चिंतन की नहीं बल्कि जीने की भाषा है। इसमें वह ताकत है जिसके माध्यम से एक ही शब्द को अलग-अलग अर्थों में व्यक्त किया जा सकता है।
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प्रो. विजय नाथ मिश्रा ने कहा कि बनारस के अंदर जो मिजाज़ है वह उसकी भाषा में साफ दिखता है। प्रो. कृष्णमोहन पांडेय ने कहा कि अंग्रेजी रोजी रोटी की भाषा हो सकती है लेकिन वह हमारी पहचान नहीं हो सकती है। भाषा से हमारी अस्मिता जुड़ी है। अध्यक्षता करते हुए प्रो. राजा वशिष्ठ त्रिपाठी ने विदेशों में भोजपुरी की ताकत के बारे में विस्तार से बताया। प्रो. सरफराज आलम ने कहा कि मातृभाषा दिवस अपनी भाषा को बचाये रखने की लड़ाई में शामिल होने का दिन है। अतिथियों का स्वागत केंद्र समन्वयक प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल ने किया। इस दौरान शोध छात्र मनोहर प्रजापति, नवनीत, चंदा ने लोकगीत की प्रस्तुति कर भोजपुरी की मिठास का एहसास कराया। कार्यक्रम का संचालन शोध छात्र उदय पाल और धन्यवाद ज्ञापन प्रो. चम्पा कुमारी सिंह ने दिया।
बीएचयू महिला महाविद्यालय बांग्ला विभाग की ओर से मातृभाषा दिवस पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में आलोचक प्रो. अवधेश प्रधान ने कहा कि मातृभाषा ही भारत जैसे बहुआयामी देश में सर्वशिक्षा को आसान करती है। प्रो. वी चक्रवर्ती ने कहा कि अपनी भाषा से प्यार ही सबकी भाषा का आदर है। अतिथियों का स्वागत प्राचार्य प्रो. चंद्रकला त्रिपाठी ने किया। कार्यक्रम में डॉ. सोमा, प्रो. सुशीला सिंह, शची उपाध्याय, प्रो. वशिष्ठ नारायण त्रिपाठी, प्रो. सरोज रानी आदि मौजूद रहे। बीएचयू के कमेटी कक्ष में आयोजित कार्यक्रम में अधिकारियाें-कर्मचारियों ने मातृभाषा के उत्थान पर जोर दिया।
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