रामनगर। स्वाहा... स्वाहा... स्वाहा...रावण के साथ कुंभकर्ण और विभीषण ने रामबाग के सामने यज्ञ मंडप में आहुति दी। रावण अपने सिर काटकर हवन कुंड में अर्पित करता जा रहा था और पीछे खड़े लीला कमेटी के पदाधिकारी परदा डाल कर उसके मुखौटे बदलते जा रहे थे। दूसरी ओर हंस पर सवार ब्रह्मा, नंदी पर सवार महेश और मोर पर सवार विष्णु यज्ञ स्थल पर प्रगट हुए। लीला देखने के लिए एक ओर हाथी पर सवार काशिराज डॉ. अनंत नारायण सिंह अपने संतरियों, सिपहसालारों के साथ थे तो दूसरी ओर गंजा-गमछा, धोती, दुपट्टा में सजे-संवरे लीला प्रेमियों का हुजूम। कोई पालथी मारकर पीढ़े पर रामायणियों के साथ चौपाई दोहरा रहा था तो कोई खड़े होकर। हर कोई अपनी धुन और मस्ती में लीला के भावों में निमग्न था।
यज्ञ सफल होते ही ब्रह्मा ने रावण की इच्छा के अनुसार वरदान दिया कि अब मनुष्य और वानर के सिवा कोई भी उसे मार नहीं सकेगा। कुंभकर्ण ने जहां छह महीने सोने और एक दिन जागने का वरदान मांगा वहीं विभीषण ने भगवान के चरणों में निष्काम प्रेम पाने का वरदान मांगा।लेकिन ब्रह्मा ने उसी समय लंकिनी को बता दिया रावण लंबे समय तक राज करेगा। एक समय ऐसा आएगा जब एक वानर का तुम निरादर करोगी और वह तुम्हें एक मुक्का मार कर विकल कर देगा। तब तुम समझना कि राक्षसराज का अंत नजदीक आ गया है।
उधर, वरदान पाने के बाद दंभ से चूर रावण ने अत्याचार से देवलोक में आतंक फैला दिया। पहले दिन की चलायमान लीला तीन स्थानों से होकर गुजरी। रावण को जब सोने की लंकापुरी के बारे में पता चला तो उसने लंका पहुंच कर उसे कब्जा कर लिया। कुबेर पर चढ़ाई कर उनका पुष्पक विमान छीन लिया । भयभीत देवराज इंद्र देवताओं को लेकर बैकुंठ पलायन कर गए। राक्षस राज के अत्याचार से धरती कांप उठी।
यहां पर श्रीरामचरितमानस के बालकांड की कुछ चौपाइया के गायन के बाद लीला को एक घंटे का विराम दिया गया। काशिराज ने इसी अवधि में संध्या वंदन किया। इसके बाद रावण कैलाश पहुंचता है और कैलाश को अपनी भुजाओं से नापने लगता है। इसके बाद देवता क्षीरसागर में भगवान विष्णु के समक्ष रावण के अत्याचार की दुहाई देने पहुंचते हैं। वहीं भविष्यवाणी होती है कि राम के रूप में वह दशरथ कुल में जन्म लेकर रावण के अत्याचार से मुक्ति दिलाएंगे। क्षीरसागर की भव्य झांकी निहारने के लिए रामबाग पोखरे पर लीला प्रेमियों का सैलाब उमड़ पड़ा था।