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घुमंतू गिरोह ने पुलिस को ‘घुमाया’

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वाराणसी। मुठभेड़ में दबोचे गए पचास हजार के इनामी धर्मेंद्र नट के एक खुलासे से पुलिस भी हैरान रह गई। पिछले नवंबर में मादक पदार्थों की तस्करी के आरोप में जिस विनोद नामक शख्स को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया, उसने न सिर्फ अपना पता बल्कि पिता का नाम भी फर्जी बताया था। वह घुमंतू गिरोह से जुड़ा 12 हजार रुपये का इनामी अपराधी है। तब पुलिस को इसकी भी भनक नहीं लग पाई थी। धर्मेंद्र नट के खुलासे के बाद पुलिस जेल में बंद विनोद के विरुद्ध अब धोखाधड़ी का एक और मुकदमा दर्ज करने की तैयारी में है।
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विनोद को मादक पदार्थों की तस्करी के आरोप में नवंबर 2017 में जीआरपी मुगलसराय ने गिरफ्तार कर पुलिस को सौंपा था। धर्मेंद्र नट से पूछताछ में पता चला कि विनोद उसकी बुआ का लड़का है। वह न तो गाजीपुर के जमनिया का रहने वाला है न ही उसके पिता का नाम बलमू डोम है। विनोद बिहार के सासाराम के विक्रमगंज का रहने वाला है और उस पर 12 हजार का इनाम घोषित है। इनामी धर्मेंद्र ने जब यह राज खोला तो पुलिस के होश उड़ गए।
धर्मेंद्र से पूछताछ में घुमंतू गिरोह से जुड़ी कई और चौंकाने वाली जानकारियां सामने आई हैं। गिरोह के सदस्य, उनकी पत्नियां और बच्चे भीख मांगने और कूड़ा बीनने जैसे काम की आड़ में घरों और दुकानों की रेकी करते हैं। तस्दीक के बाद गिरोह रात में चोरी और लूटपाट की वारदात को अंजाम देता है। पकड़े जाने पर गिरोह के सदस्य कभी अपनी पहचान नहीं बताते। फर्जी नाम-पते के जरिए पुलिस को गुमराह करते हैं। अधिकतर सदस्यों का कोई स्थायी ठिकाना न होने से पुलिस तस्दीक भी नहीं कर पाती। बक्सर जिले के बाराडीह सासाराम, मठिया मोहल्ला, छपरा के रिविलगंज क्षेत्र के दर्जनों नट परिवार शहर में रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों के साथ ही हाइवे किनारे जगह-जगह डेरा डालकर रह रहे हैं। गिरोह का जाल बिहार से आसपास के जिलों तक फैला है। क्राइम ब्रांच प्रभारी व्रिकम सिंह ने बताया कि मुगलसराय जीआरपी से संपर्क कर विनोद के खिलाफ धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज कराया जाएगा। साथ ही, अस्थाई झोपड़ियां और टेंट लगाकर रहने वाले परिवारों की छानबीन की जाएगी।
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... लेकिन पुलिस लापरवाह
रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों के अलावा हाईवे किनारे अस्थाई तौर पर टेंट-झोपड़ी लगाकर रहने वाले खानाबदोशों के बीच अपराधी भी शरण लेते हैं। बावजूद इसके पुलिस इन अस्थाई बस्तियों में जाकर तस्दीक और निगरानी की जरूरत नहीं समझती। उच्चाधिकारियों के निर्देश भी खानापूर्ति तक सीमित रह जाते हैं।
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