वाराणसी। सवा सौ वर्ष पुरानी चेतगंज की विश्व विख्यात नक्कटैया रामलीला में राष्ट्रीय मुद्दों पर आधारित झांकियों की झलक पाने के लिए सड़कों पर जन समुद्र उमड़ पड़ा। रंग-बिरंगी झालरों से छतरीनुमा सजाई गई मुहल्लों की गलियां-सड़कें रोशनी से नहा उठीं। भोंपू के शोर गूंजने लगे। रंग-बिंरगे गुब्बारे, फिरकी और तरह-तरह के खिलौनों से खुशियों का संसार रच-बस गया। छतों, बारजों के अलावा गलियों के दोनों ओर चबूतरों पर महिलाओं, बच्चों की कतार झांकियों को निहारने के लिए आतुर थी। रात 12.15 बजे जिलाधिकारी योगेश्वर राम मिश्र ने चेतगंज थाने के पास उद्घाटन की रस्म निभाई और फिर रावण, कुंभकर्ण समेत खर-दूषन की सेना हाथी, घोड़े ऊंच से सुसज्जित होकर निकल पड़ी। 134 वर्ष पहले 1888 में धार्मिक झांकियों और स्वांगों के जरिए अंग्रेजों का विरोध करने के लिए इस चलायमान लीला की शुरुआत बाबा फतेह राम ने की थी।
चेतगंज चौराहे के पास रविवार की रात नौ बजे सूपर्णखा की नाक लक्ष्मण ने काटी। इसके साथ ही इस लीला का मंचन आरंभ हुआ। बदला लेने के लिए आगे-आगे कटी नाक लेकर सूपर्णखा चली और उसके पीछे मुहल्ले के सैकड़ों बच्चे निकल पड़े। मलदहिया के पटेल चौराहे से रात 12 बजे नक्कटैया की झांकियां हाथी, घोड़े, ऊंटों से सुसज्जित खर-दूषन की सेना के रूप में निकाली गईं। पिशाचमोचन, चेतगंज थाने से होकर लहुराबीर चौराहा, चउरछटवा, चेतगंज चौमुहानी, बेनबाबा मंदिर से मथुरा प्रसाद रोड तक जहां से झांकियां गुजरीं उन रास्तों की छटा देखते बन रही थी। दिन -रात के फर्क मिट चुके थे। सिर्फ रेला ही रेला चल रहा था। नक्कटैया में शामिल 50 से अधिक लाग-विमानों में दुर्गा, काली, हनुमान के अलावा राक्षसों के भी रूप में बच्चे रथों और ट्रालियों पर सवार थे। बांस-बल्ली के सहारे विद्युत झालरों से सुसज्जित स्वागत द्वारों की आभा दमकती रही। चेतगंज रामलीला समिति के अध्यक्ष अजय गुप्ता और वरिष्ठ उपाध्यक्ष महेंद्र निगम व्यवस्था संभाल रहे थे। देवी-देवताओं, असुरों की झांकियों के अलावा बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, कश्मीर में सेना के जवानों पर पथराव, चाइनीज सामानों के बहिष्कार समेत सामाजिक सरोकारों से जुड़े अन्य मुद्दों पर आधारित झांकियां देखने के लिए रात भर लोग सड़कों पर चलते रहे।