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वतन की आबोहवा में रमे बरसों बाद आए ‘अपने’

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वाराणसी। बरसों अपने देश से दूर रहे तो क्या, जन्मभूमि से रिश्ता दिल से जुड़ा है। यही वजह है कि लंदन, पेरिस, दुबई और कनाडा से बरसों बाद आने के बावजूद प्रवासी भारतीय यहां की आबोहवा में रचे बसे नजर आए। काशी के आतिथ्य, अध्यात्म और कुंभ के जरिये उन्हें अपनी जड़ों से जुड़ने का मौका मिला है, जिससे वह अभिभूत हैं। अतिथि यहां से उम्र भर के लिए बेहतरीन यादें साथ ले जाना चाहते हैं।
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15 साल से कनाडा के लीगल प्रोफेशनल के तौर पर काम कर रहे नरेश चंद्रा कहते हैं कि यहां से हम जो अनुभव लेकर जाएंगे, वह दुनिया के किसी भी कोने में जाने से नहीं मिलता। काशी की परंपरा और संस्कृति के साथ कुंभ के अध्यात्म का दर्शन मेरे लिए खास होगा। इस बार ये मौका खो देता तो शायद फिर ये अविस्मरणीय पल कभी नहीं मिलते। इनके दोस्त राकेश पटेल का कहना है कि सामाजिक और सांस्कृतिक तानाबाना ही यहां की पहचान है, जिसे मैं इन तीन दिनों में जीना चाहता हूं और यहां से सुखद यादें साथ ले जाना हूं।
फ्रांस से अपनी बेटी को यहां की संस्कृति से परिचित कराने हिना पटेल आई हैं। इनकी बेटी हेमानी पटेल का कहना है कि इंडिया आकर यहां के रीति रिवाजों, परंपराओं से जुड़ना अच्छा लगता है। इनके साथ आईं ज्योत्सना देसाई कहती हैं कि हिंदुस्तान जन्मभूमि है और फ्रांस कर्मभूमि। चूंकि वहां रहते 35 साल हो गए, इसलिए उससे जुड़ाव है, लेकिन हिंदुस्तान दिल में बसता है। दुबई से आए धर्मलिंग भास्कर भी खुद को खुशकिस्मत मानते हैं। रामेश्वरम में उनकी जड़ें हैं। कहते हैं द्वादश ज्योतिर्लिंगों में एक काशी और रामेश्वरम के बारे में क्या बताना। खुश हूं यहां आकर। भगवान शिव की ये नगरी अलौकिक है। भास्कर दुबई में फ्रेंड्स ऑफ इंडिया संस्था के जुड़े हैं।
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