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लोक के बिना नहीं हो सकता साहित्य सृजन

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वाराणसी। बीएचयू के भोजपुरी अध्ययन केंद्र की ओर से शनिवार को आयोजित परिचर्चा में वक्ताओं ने साहित्य के लोकपक्ष पर विस्तृत चर्चा की। बतौर मुख्य वक्ता जाने माने आलोचक प्रो. अरुण होता ने कहा कि लोक के बिना साहित्य सृजन नहीं हो सकता है। जो रचनाकार अधिक देर तक टिकते हैं, उनकी मूल चेतना ही लोक की चेतना है।
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राहुल ग्रंथागार में साहित्य का लोकपक्ष विषयक परिचर्चा में प्रो. होता ने कहा कि भूमंडलीकृत दुनिया की हकीकत बाजारवाद है। साहित्य लोकवादी मूल्यों पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि जो साहित्य अभिजन चेतना को लेकर चलता है वह क्षणजीवी होता है, जबकि लोक चेतना को लेकर चलने वाला साहित्य शाश्वत मूल्यों का संवाहक होता है। अध्यक्षता करते हुए प्रो. राजकुमार ने कहा कि हिंदी साहित्य का प्रारंभ ही लोक चेतना के जुड़ाव से हुआ और उसका विकास भी लोक परंपरा से बहुत कुछ लेकर ही हुआ। युवा कवि सुधांशु फिरदौस ने भोजपुरी नाटकों का लोकपक्ष विषय पर बोलते हुए कहा कि शास्त्र और लोक का रिश्ता संवादी रिश्ता है। कई बार हमें लोक की चेतना का शास्त्रीय चेतना में और कई बार शास्त्र की चेतना लोक चेतना में बदलाव दिखाई देता है। अतिथियों का स्वागत करते हुए समन्वयक प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल ने कहा कि साहित्य बुनियादी स्तर पर लोकधर्मी होता है। साहित्य बिना स्मृति के लिखा ही नहीं जा सकता। कार्यक्रम का संचालन शोध छात्र हिमांशु द्विवेदी, धन्यवाद ज्ञापन डॉ. शिल्पा सिंह ने किया। इस दौरान बड़ी संख्या में छात्र-छात्रा मौजूद रहे।
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