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धरोहर बचाओ समिति की बैठक में भिड़ गए दिग्गज

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वाराणसी। विश्व धरोहर दिवस पर काशी की धरोहर बचाने के लिए हुई बैठक में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और सपा एमएलसी शतरूद्र प्रकाश के बीच तकरार हो गई। दोनों के बीच आरोप-प्रत्यारोप इस कदर बढ़ गए कि दस मिनट तक हंगामे की स्थिति रही। बाद में दोनों ने एक-एक कर वॉकआउट कर दिया।
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बुधवार को विश्व धरोहर दिवस पर पराड़कर स्मृति भवन में धरोहर बचाओ समिति की ओर से विद्वत बैठक आयोजित की गई थी। इसमें पहुंचे सपा एमएलसी शतरूद्र प्रकाश ने काशी विश्वनाथ मंदिर को धरोहर घोषित करने की बात कही। बताया, जगन्नाथ पुरी, कोणार्क मंदिर और कामाख्या देवी के मंदिर पहले से इस श्रेणी में शामिल किए जा चुके हैं। कहा कि इसके लिए वह 10 साल से विधान परिषद में लड़ाई लड़ रहे हैं। बाबा दरबार के प्राचीन स्वरूप को बरकरार रखने के लिए सबको एकजुट होना होगा। इसके बगैर इसमें सफलता नहीं मिलेगी।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद यह सुनकर उखड़ गए। उन्होंने तेज आवाज में शतरूद्र प्रकाश के विश्वनाथ मंदिर को धरोहर कहे जाने का प्रतिकार किया। कहा, मंदिर को धरोहर कहना गलत है। धरोहर वो है जिसमें जीवन नहीं है जबकि विश्वनाथ मंदिर पूरी तरह से जीवंत है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने विश्वनाथ मंदिर परिक्षेत्र में हो रही तोड़फोड़ पर नाराजगी जताई। कहा, जिस तरह से हजारों साल से पूजित प्रतिमाओं को तोड़ा जा रहा है, वह उनकी रक्षा के संकल्प से कार्यक्रम में आए थे, धरोहर दिवस के कार्यक्रम में नहीं।
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इसके बाद इस मुद्दे पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और शतरूद्र प्रकाश के बीच करीब दस मिनट तक तीखी बहस हुई। शतरूद्र प्रकाश के साथ आए सपा के महानगर अध्यक्ष राजकुमार जायसवाल व अन्य नेता उनके पक्ष में आ गए। दोनों तरफ से आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गया। गर्मागर्म माहौल में पहले शतरूद्र प्रकाश बैठक छोड़ बाहर निकल गए। बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद भी अपने अनुयाइयों संग वहां से चले गए।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि यदि कोई मंदिर धरोहर में शामिल हो जाता है तो वहां पूजा-पाठ पूरी तरह से प्रतिबंधित हो जाते हैं। काशी विश्वनाथ मंदिर को धरोहर घोषित करने की मांग शामिल करने वाले यहां पूजा-पाठ पर पाबंदी लगाने की साजिश में संलिप्त लग रहे हैं।
शतरूद्र प्रकाश, एमएलसी ने बताया कि भारत में धरोहरों के संरक्षण के लिए कानून है। धरोहर घोषित करने से पूजा पद्धति पर कोई पाबंदी नहीं लगती है। इसके प्रबंधन में शासन-प्रशासन का हस्तक्षेप नहीं होता है। ऐसा होने पर मंदिर के पौराणिक स्वरूप को यथावत रखा जाता है।
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