'अमर उजाला' का चुनावी रथ 'सत्ता का संग्राम' 29 नवंबर को हाथरस में था। यहां चाय पर चर्चा, युवाओं और महिलाओं से बात के बाद हींग कारोबार का भी जायजा लिया गया।
हाथरस को पूरी दुनिया में अब एक नई पहचान मिल गई है। यहां के हींग और रंगों के कारोबार को काफी प्रोत्साहन मिल रहा है। खास बात ये है कि अब बड़े पैमाने पर यहां छोटे-छोटे हींग और रंगों को बनाने की यूनिटें लग चुकी हैं। लोग अपने घरों से छोटे स्तर पर इसका काम शुरू कर चुके हैं। ये कहना है हाथरस के बड़े हींग कारोबारी राम बिहारी अग्रवाल का। वे बताते हैं कि यूपी में वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट यानी ओडीओपी स्कीम आने के बाद बड़ी संख्या में लोगों ने इस कारोबार को शुरू किया है। सरकारी मदद से लोग हींग के कारोबार को बड़े पैमाने पर करने लगे हैं।
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कैसे बनता है हींग?
राम बहारी अग्रवाल बताते हैं कि पेस्ट के रूप में हींग अफगानिस्तान से यहां लाया जाता है। ये पेड़ से दूध की तरह निकलता है, जिसे अफगानिस्तान में पेस्ट का रूप दिया जाता है। फिर उसे भारत में लाकर फिनिशिंग और यहां के मानकों के अनुसार तैयार करते हैं। पेस्ट के रूप में आने वाले हींग को पहले गलाते हैं, फिर सुखाते हैं और अंतिम में ब्लेंडिंग मशीन से उसकी प्रॉसेसिंग करते हैं। बाद में उसकी पैकिंग करके मार्केट में सप्लाई कर देते हैं। प्रॉसेसिंग के दौरान हम अलग-अलग तरह के फ्लेवर बनाते हैं। हींग की शुद्धता के अनुसार उसके दाम तय होते हैं।
कहां-कहां होता है सप्लाई?
हाथरस का हींग अब न केवल पूरे भारत में बल्कि दुनिया के कई अन्य देशों में सप्लाई की जाती है। राम बिहारी अग्रवाल बताते हैं कि ओडीओपी में हींग का नाम आने के बाद से इसका कारोबार यहां काफी बड़ गया है। अच्छी बात ये है कि अब इसकी सप्लाई दुनिया के कई देशों में होने लगी है। हालांकि, कानपुर, मुंबई, दिल्ली समेत कुछ अन्य जिलों में भी हींग तैयार की जाती है।