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उत्तर प्रदेश: एक ऐसा गांव जहां हर हफ्ते होती हैं हादसों में मौतें, इस विधानसभा चुनाव में बन रहा यह मुद्दा

Sat, 11 Dec 2021 05:24 PM IST
Harendra Chaudhary सीतापुर के मदारीपुर से आशीष तिवारी की ग्राउंड रिपोर्ट।

सार

हाईवे का दंश इस गांव के लोग बीते कई दशकों से झेल रहे हैं। कई दशकों से हर सप्ताह दो से तीन लोगों की मौत तो आम बात है। यह मौतें किसी और वजह से नहीं बल्कि हाईवे पर असुरक्षित गांव की और उससे जुड़ने वाली सड़क की वजह से है। गांव के लोग इस विधानसभा के चुनाव में यहां होने वाली मौतों को चुनावी मुद्दा बना रहे हैं। अमर उजाला मदारीपुर गांव पहुंचा और लोगों की समस्याएं और सुविधाओं के बारे में बातचीत की।
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नेशनल हाईवे 24 पर स्थित मदारीपुर गांव के लोग - फोटो : Amar Ujala/ Ashish Tiwari
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विस्तार
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लखनऊ से दिल्ली को जोड़ने वाला नेशनल हाईवे 24 जिला सीतापुर से होकर गुजरता है। इसी हाईवे पर एक गांव है मदारीपुर। कहने को यह गांव राष्ट्रीय राजमार्ग के एकदम बगल में है, तो अनुमान लगाया जाता है कि यहां विकास की गंगा तो बहती ही होगी और हाईवे का सुख भी इस गांव के लोगों को मिलता ही होगा। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं है। बल्कि हाईवे का दंश इस गांव के लोग बीते कई दशकों से झेल रहे हैं। दरअसल इस गांव में बीते कई दशकों से हर सप्ताह दो से तीन लोगों की मौत तो आम बात है। यह मौतें किसी और वजह से नहीं बल्कि हाईवे पर असुरक्षित गांव की और उससे जुड़ने वाली सड़क की वजह से है। गांव के लोग इस विधानसभा के चुनाव में यहां होने वाली मौतों को चुनावी मुद्दा बना रहे हैं। अमर उजाला मदारीपुर गांव पहुंचा और लोगों की समस्याएं और सुविधाओं के बारे में बातचीत की।

गांव की सड़क को काटता है हाईवे

मदारीपुर गांव के बुजुर्ग हरिनाम कहते हैं कि बीते कई सालों से तो वह दुर्घटनाएं देख ही रहे हैं। उनका कहना है कि उनके गांव से निकलने वाली सड़क हाईवे को पार करती है। क्योंकि हाईवे पर ओवर स्पीड में गाड़ियां चलती हैं नतीजतन लोगों की दुर्घटना में मौत हो  जाती है। वह बताते हैं कि यहां पर हर हफ्ते दो से तीन लोगों की मौत दुर्घटना में हो जाती है। हरिनाम के मुताबिक जरूरी नहीं कि यह दुर्घटना उनके गांव के लोगों के साथ हो। लेकिन मौत तो मौत ही होती है। वह चाहे उनके गांव की हो या बाहर के लोगों की। इसलिए जिम्मेदार लोगों को कुछ ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए, ताकि बेवजह किसी की जान न जाए। हरिनाम के मुताबिक यहां होने वाली दुर्घटनाओं को लेकर स्थानीय विधायक से लेकर जिला प्रशासन और पुलिस प्रशासन तक से बातचीत की गई लेकिन सुरक्षा को लेकर कोई भी उपाय नहीं किए गए।

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मदारीपुर के पूर्व प्रधान अशोक कहते हैं कि जब गांव से हाईवे को जोड़ने वाली रोड पर कोई सुरक्षाकर्मी या ट्रैफिक पुलिसकर्मी तैनात नहीं होता है, तब तक यह दुर्घटनाएं होती रहेंगी। इसी गांव के रहने वाले सोनू बताते हैं कि वह अपने गांव के लोगों को हमेशा सचेत भी करते रहते हैं कि हाईवे पर संभल कर ही चलें। उन्होंने बताया कि पिछले हफ्ते ही एक मारुति वैन की टक्कर यहां पर हुई और कई लोग घायल हो गए। उसमें दो लोगों की मौत भी हो गई। गांव के हरिराम कहते हैं ऐसा कोई भी महीना नहीं जाता है जब उनके गांव के लोग यहां पर होने वाली दुर्घटनाओं में लोगों की मदद के लिए दर्जनों बार अस्पताल न जाते हों। गांव के लोग कहते हैं कि इस बार के विधानसभा चुनाव में वह चुनाव लड़ने वालों से इस समस्या के निराकरण पर बात करेंगे और उसके बाद ही मतदान करेंगे।

आजादी के बाद पहली बार बिजली 2014 में आई

मदारीपुर में विकास को लेकर बात करने पर गांव के लोगों में बहस छिड़ गई। गांव के पूर्व प्रधान अशोक कहने लगे कि 2014 से पहले तो इस गांव में बिजली ही नहीं थी। उनका कहना है यह तो मोदी सरकार की देन है कि 2014 में उनकी सरकार बनी और उसके बाद गांव में बिजली आई। पूर्व प्रधान कहते हैं 1984 में इस गांव में बिजली के खंभे लगा दिए गए थे कि गांव रोशन होगा। बगल में खड़े सत्तर साल के मातादीन टोकते हैं कि 1984 में नहीं 1964 में ही यहां पर बिजली के खंभे डाले गए। 50 साल में खंभे तक गायब हो गए लेकिन बिजली 2014 में ही आ पाई। मातादीन और अशोक की बात को काटते हुए गांव के ही सर्वेश कहते हैं कि मायावती की सरकार थी तो तय हुआ था बिजली आएगी। सर्वेश कहते हैं अगर मायावती की सरकार होती तो यह बिजली उनके दौर में ही आ जाती लेकिन बाद में आई दूसरी सरकारों ने उनके गांव में बिजली ही नहीं दी। बहस के बीच में ओम बोल पड़े और कहने लगे कि गांव के लोगों को अब वोट जिम्मेदारी के साथ ही देने होंगे। वह कहते हैं अगर ऐसा नहीं हुआ तो फिर इसी तरह विकास के लिए 50 साल तक इंतजार करना होगा।

बात विकास की हो रही थी तो उसी भीड़ में खड़े 27 साल के राजकुमार बोल पड़े, आप विकास की बात कर रहे हो, लेकिन यह किस तरीके का विकास हुआ जब देश के बेरोजगारों को ही ठगा जाने लगे। राजकुमार कहते हैं अभी हाल में हुई टीईटी की परीक्षा से ज्यादा बड़ा मजाक और क्या हो सकता है। राजकुमार ने बताया कि वह आधा पर्चा दे चुके थे तब उनको और उनके जैसे सैकड़ों अभ्यर्थियों को बताया गया कि पर्चा लीक हो गया है, अब आप जाइए, परीक्षा की अगी तारीख बाद में बताई जाएगी। सरकार से नाराजगी जताते हुए कहते हैं कि अगर आप परीक्षा फुलप्रूफ नहीं करा सकते हो तो आप सरकार और शासन सत्ता कैसे फुलप्रूफ तरीके से चलाओगे। उन्होंने कहा कि पूरे सिस्टम में खामियां हैं। जब तक सिस्टम नहीं दुरुस्त होगा तब तक कुछ नहीं हो सकता। राजकुमार के भाई राजू कहते हैं कि सीतापुर के बगल में नैमिषारण्य है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने तीर्थस्थल के जीर्णोद्धार के लिए 450 करोड़ रुपये वहां पर दे दिए। राजू ने नाराजगी जताते हुए कहा कि आप वहां मंदिर बनवा दो, लेकिन जरूरतमंद को अगर आप रोजगार नहीं दे पाओगे तो वह मंदिर में जाकर सिर्फ पूजा अर्चना करके कैसे पेट भरेगा। उन्होंने कहा कि इस सरकार में बेरोजगार बहुत परेशान है। उसको रोजगार नहीं मिल रहा है। इसलिए वह सरकार बदलना चाहते हैं।

पक्के मकान न मिलने से नाराजगी

इसी गांव की अंजना ने पूर्व प्रधान अशोक से बातचीत के दौरान कह दिया कि उन्हें अब तक पक्का मकान नहीं मिला। इस पर अशोक ने जवाब दिया कि अब वह प्रधान तो हैं नहीं कि उन्हें पक्का मकान दिला सके। उन्होंने भी माना कि गांव के लोगों को अभी भी पक्के आवास नहीं मिल सके हैं। अंजना ने बताया कि उनके बेटे को पात्रता सूची में रखा गया था ताकि उसको पक्का आवास मिल सके। लेकिन कई साल गुजर गए अब तक उसको पक्का आवास नहीं मिला है। पक्के आवास की समस्या को लेकर गांव के और भी बहुत से लोगों ने आवाज उठाई। गांव के मातादीन कहते हैं कि उनकी ग्राम पंचायत मदारीपुर में तीन गांव आते हैं। तीनों गांव में अभी भी कई पात्र ऐसे हैं, जिन्हें घर मिलना चाहिए था लेकिन नहीं मिल सका। उन्होंने बताया कि विधायक से मिलो तो वह अधिकारियों के पास भेज देते हैं और अधिकारी के पास जाओ तो वह ग्राम प्रधान और ग्राम विकास अधिकारी के पास भेज देते हैं। कुल मिलाकर जरूरतमंद गांव के लोगों को अधिकारी और नेताओं ने फुटबॉल बना दिया है। इसलिए इस बार के विधानसभा चुनाव में वह ऐसे किसी भी गैर जिम्मेदार नेता को नहीं चुनेंगे जो उनकी मदद ना कर सके।

युवा वोटर को योगी-मोदी पसंद, बेरोजगारों को अखिलेश

इसी गांव के रहने वाले और पहली बार वोट डालने वाले शिवा कहते हैं कि उन्हें नहीं पता है कि असल मुद्दे क्या हैं लेकिन वह खुलकर कहते हैं उन्हें योगी और मोदी पसंद हैं। योगी-मोदी की पसंद पर उनका अपना मत है। शिवा कहते हैं कि डबल इंजन की सरकार जब रहती है तो विकास तेजी से होता है। बेरोजगार राजकुमार कहते हैं कि कम से कम अखिलेश की सरकार में परीक्षाओं के पर्चे तो लीक नहीं होते थे। गांव के अमन कहते हैं कि इस सरकार में सिर्फ और सिर्फ मंदिर-मस्जिद की बातें हो रही हैं। उनका कहना है गांव के लोग समझ रहे हैं कि चुनाव सिर पर हैं तो मंदिर-मस्जिद की बातें भी होंगी। उनका अपना तर्क है। अमन के मुताबिक आप आस्था को जबरदस्ती थोप नहीं सकते हैं। अगर कोई मंदिर जा रहा है तो न आप उसको रोक सकते हैं और अगर कोई मस्जिद जा रहा है तो भी आप उसे नहीं रोक सकते हैं। उनके मुताबिक आने वाले चुनाव में लोगों को इस बात का ध्यान भी रखना होगा कि वह मंदिर मस्जिद के बहकावे में आकर वोट ना करें बल्कि विकास को ध्यान में रखकर वोट करें।

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गांव के गलियारे में चल रही चुनावी चर्चा के बीच में खेत से आ रहे रामखेलावन रुक गए। कुछ देर बाद सुनने के बाद कहते हैं कि सड़क के उस पार उनका तीन बीघा खेत है। वे कहते हैं पिछली फसल जानवरों ने रौंद डाली थी। इस बार की भी फसल जानवरों ने खत्म कर दी है। वह कहते हैं अगर छुट्टा जानवरों पर सरकार कोई लगाम नहीं लगा सकती, तो कम से कम इन जानवरों की वजह से बर्बाद होने वाली फसल का मुआवजा ही तय कर दे। पास में खड़ी जय देवी भी उनकी बात का समर्थन करती हैं। वे कहती हैं थोड़ा बहुत पैसा होता है उसे फसल में लगा दिया जाता है, लेकिन जानवर उनकी फसल को बर्बाद कर देते हैं। इससे उनकी जमा पूंजी तो बर्बाद होती ही है फसल भी पूरी तरीके से नष्ट हो जाती है। जय देवी के मुताबिक न प्रधान, न विधायक, न प्रशासन, न पुलिस, छुट्टा जानवरों से उनका कोई बचाव नहीं कर पाता है। यही वजह है कि इस बार सरकार बदलने के लिए वोट करने की तैयारी कर रही हैं।

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