वासना मय कर्म अधर्म है, जबकि उपासना मय कर्म ही शाश्वत धर्म है। इसी धर्म पर चलने की जरूरत है, जो उपासना में बाधक बने उसका परित्याग कर देना ही उचित है।
मोटेश्वर महादेव मंदिर के सामने पार्क में चल रहे 63वें सनातन धर्म सत्संग समारोह के तीसरे दिन कानपुर के आचार्य पुरुषोत्तम त्रिवेदी ने धर्म कर्म के औचित्य को परिभाषित करते हुए यह संदेश दिए। कहा कि संसार में अनेक धर्मों का चलन है, किंतु यह सभी वासना मय हैं, इनमें क्षणिक सुख की अनुभूति भले हो, लेकिन दु:खों से पीछा नहीं छूटता।
वहीं भगवान की उपासना का मार्ग ही सच्चा धर्म है। इसी धर्म का प्रेमी साधक अपने साध्य को प्राप्त करने में सफल हो जाता है। वह अनिरवचनीय आनंद को भी प्राप्त कर लेता है। उन्होंने सांसारिक माया मोह, क्रोध, लोभ आदि विकारों को उपासना मार्ग में बाधक बताया और बाधक तत्वों का सर्वथा परित्याग करने को ही कल्याणकारी बताया।
सीतापुर से आए भागवताचार्य मनोज दीक्षित ने संगीतमयी शैली में ज्ञानोपदेश दिया और राम वनगमन के मार्मिक प्रसंग के जरिए उन्होंने प्रेम के स्वरूपों का दर्शन कराया।
उनका कहना था कि राम के प्रति सभी का अनन्य प्रेम है, फिर भी प्रेम के विविध रुप सामने आते हैं। राजा दशरथ का सत्य प्रेम, जनक का गूढ़ प्रेम, मुनियों का तत्व प्रेम, भरत का आगमन प्रेम सिद्ध करते हुए उन्होंने श्रोतों को पुलकित कर दिया।
आयोजक संत प्रवर स्वामी रामस्वरूप ब्रह्मचारी ने अहेतुकी भक्ति पर जोर दिया और अपनी चितवृति में गोविंद को बसाए रखने का संदेश देते हुए राम जैसा राजा, भरत जैसा भाई, सीता जैसी पत्नी बनकर समाज को गौरवांवित करने की प्रेरणा दी। उन्होंने युवकों से हनुमानजी के चरित्र से प्रेरणा लेते हुए कर्तव्य पथ पर डटे रहने की अपील की।
इसी प्रकार आदित्य त्रिपाठी, शिवशंकर मिश्र, सतीश त्रिपाठी आदि ने भी राम कथा के माध्यम से चरित्र निर्माण की सीख दी।