प्रशांत दीक्षित
उन्नाव। जिले में टिटनेस से होने वाली मातृ-शिशु
मृत्यु दर शून्य हो गई है। पिछले सप्ताह विश्व स्वास्थ्य संगठन की सीएमओ
कार्यालय भेजी गई रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ है।
डब्ल्यूएचओ (विश्व स्वास्थ्य संगठन) पंद्रह दिसंबर को इसका प्रमाण पत्र भी जारी कर देगा।
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विभाग के आंकड़ों के अनुसार जिले की लगभग 32 लाख की आबादी में प्रतिवर्ष
99 हजार महिलाएं गर्भवती होती हैं। इसमें 85 हजार महिलाएं बच्चों को जन्म
देती हैं।
वर्ष 2002 तक के आंकड़ों पर गौर करेें तो पाते हैं कि
बच्चे को जन्म देने वाली महिलाओं में दो प्रतिशत ऐसी प्रसूताएं थी जिन्हें
टिटनेस की बीमारी होने से जच्चा व बच्चा दोनों की मौत हो जाती थी। इसमें
लगभग 17 सौ प्रसूताएं प्रतिवर्ष इसका शिकार होती थीं।
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विभाग के अधिकारियों की माने तो वर्ष 1977 में गर्भवती महिलाओं के लिए इस
टीकाकरण की शुरुआत की गई। तब इतना प्रचार प्रसार न होने से परिजनों को इसकी
जानकारी ही नहीं हुई।
इससे लोग संस्थागत प्रसव कराते रहे। प्रसव
भी ऐसी जगह कराया गया जहां साफ-सफाई का ध्यान नहीं रखा जाता था। इससे
इन्फेक्शन फैल जाता था और जच्चा बच्चा दोनों की मौत हो जाती थी। धीरे-धीरे
प्रचार प्रसार बढ़ता गया। आशाओं ने भी काम करना शुरू कर दिया।
साथ
ही प्रसव को बढ़ावा देने के लिए सरकार की ओर से चलाई गईं तमाम योजनाएं
गांव-गांव पहुंची। तब लोगों में थोड़ी से जागरूकता बढ़ी। वर्ष 2007-08 में
टिटनेस से मरने वाले जच्चा-बच्चा का आंकड़ा घटकर प्रति वर्ष सात का रह गया।
डब्ल्यूएचओ (विश्व स्वास्थ्य संगठन) की पिछले सप्ताह जो रिपोर्ट
सीएमओ कार्यालय आई है उसमें टिटनेस से मरने वाले जच्चा-बच्चा का आंकड़ा
शून्य दिखाया गया है। एडिशनल सीएमओ डॉ. आर.के गौतम की माने तो विश्व
स्वास्थ्य संगठन 15 दिसंबर को इसका प्रमाण पत्र भी जारी कर देगा।