नए साल की पहली सुबह इस बार कुछ अलग रही। अमूमन हर साल कड़ाके की सर्दी के साथ नए वर्ष का आगाज होता रहा है, लेकिन इस बार ठंड के वैसे तेवर नहीं दिखे। हर जुबां पर यही चर्चा रही कि लगता है सर्दी चली गई। लोगों का कहना है कि कई सालों बाद ऐसा हुआ है कि नव वर्ष पर कड़ाके की ठंड नहीं पड़ी।
मौसम वैज्ञानिक डॉ. सीबी सिंह का कहना है कि 2011 में नए साल में इस तरह का मौसम था। उस साल भी एक जनवरी यानी नव वर्ष के पहले दिन मौसम काफी कुछ इस साल की तरह ही था। दिन में तेज धूप रही थी और हल्की ठंड थी। उसके बाद वर्ष 2012, 13, 14 व 15 में लगातार नए साल की पहली सुबह का कड़ाके की ठंड से आगाज हुआ था। ठंड ऐसी रही कि लोगों के हाड़ तक कांप गए थे। इस बार मौसम में ज्यादा गलन न होने के पीछे का मुख्य कारण यह है कि इस बार दिसंबर की शुरुआत में ही बारिश हो गई थी। जबकि पिछले सालों में देखे तो दिसंबर के अंतिम और जनवरी के शुरुआती सप्ताह में बारिश हुई है। इस कारण अभी कड़ाके की ठंड नहीं पड़ रही है। निकट भविष्य में लोगों को कड़ाके की ठंड से जूझना पड़ सकता है।
उधर, मौसम में बदलाव को लेकर स्वास्थ्य विभाग भी चिंतित हैं। सिकंदरपुर सरोसी के सीएचसी प्रभारी फिजीशियन डॉ. विजय ने बताया कि मौसम के बदलाव का सबसे अधिक असर बच्चों व बुजुर्गों पर पड़ता है। इसलिए उन्हें फुल कपड़े पहनने चाहिए। बाहर से आने के बाद अचानक आग के सामने नहीं बैठना चाहिए। इससे शरीर के तापमान पर विपरीत असर पड़ता है। बच्चों को फुल आस्तीन के कपड़े पहनाएं साथ ही उनके कानों को पूरी तरीके से ढके ताकि कानों में हवा न जा सके। कान में हवा जाने से बच्चों को जल्द ही सर्दी जुखाम हो जाता है और बच्चों को बुखार आने लगता है। बताया कि जिस तरह से मौसम में बदलाव आ रहा है यानि कभी ठंड और कभी गर्मी लगने लगती है तो इसका मतलब यह नहीं है कि गर्मी आ गई है। इसमें लापरवाही बिल्कुल न करें। गर्म कपड़ों से परहेज न करें। बल्कि जहां भी निकले गर्म कपड़ों को पहनकर ही निकलें। घरों में भी गर्म कपड़ों में ही रहें। रात को रजाई और अन्य गर्म कपड़ों को ओढ़कर ही सोएं। पंखा आदि किसी भी हालत में न चलाएं।