स्कूली रिक्शे में बच्चों को बैठाने के लिए कोई मानक तय न होने से कई बार हादसे का खतरा बना रहता है। रिक्शे में बच्चों को जिस तरह से बैठाया जाता है इससे कई बार बच्चे दुर्घटनाओं का शिकार हो जाते है। जबकि स्कूल संचालक मनमाफि क स्कूल रिक्शा किराया तो वसूल लेते है लेकिन उनकी सुरक्षा और संरक्षा दोनों को ही वह दरकिनार रखते है। जिस ओर जिला प्रशासन भी कोई ठोस कदम नही उठा रहा है।
बताते चले कि किसी भी स्कूली रिक्शे का लाइसेंस नगर पालिका ही निर्गत करती है। लेकिन खास बात यहां यह है कि नगर पालिका परिषद गंगाघाट में स्कूल रिक्शा का लाइसेंस तो निर्गत कर दिया जाता है लेकिन उसमें कितने बच्चें बैठाए जा सकते है इसका न तो कोई मानक है और न ही कोई कानून। वहीं बारे में शिक्षा विभाग का कहना है कि पहले मानक या कानून बने तो आगे की कार्रवाई की जाएं। अब ऐसे में सवाल यह उठता है कि यदि मानक तय नही होते है तो ऐसे में स्कूल रिक्शा से होने वाली किसी दुर्घटना का जिम्मेवार कौन होगा। निश्चित ही यहां अभिभावक का ही नुकसान होगा क्योंकि जब तक कानून नही बनता और मानक नही तय होते तब स्कूल संचालक इसी तरह से मनमानी करते रहेगें और स्कूल रिक्शा में बच्चों को ठूंस-ठूंस कर ले जाया जायेगा। इस बारे में जब कुछ अभिभावकों से बात की गई तो उनका सीधा सा जवाब रहा कि जब वह पूरी फ ीस दे रहें हेै तो स्कूल से घर और घर से स्कूल ले तक की जिम्मेवारी स्कूल संचालकों की बनती है लेकिन ऐसा नही हो रहा है क्योंकि जिला प्रशासन इस ओर गंभीर नहीं है। वहीं नगर के एक स्कूल के संचालकों की मानी जाएं तो वह सारी जिम्मेवारी स्कूल रिक्शा चालक पर थोप कर अपनी जिम्मेवारी से बचने की कोशिश कर रहे है। कहना है वह तो मना करते है लेकिन रिक्शा चालक मानता नहीं।
कोट
इसकी जिम्मेवारी नगर पालिका की होती है, पहले पालिका मानक तय करे उसके बाद शिक्षा विभाग अपनी ओर से स्कूल संचालकों पर कार्रवाई करेगा। देवकी सिंह, जिला विद्यालय निरीक्षक उन्नाव।
कोट
नगर पालिका में ऐसा कोई कानून या फि र मानक तय नहीं है, जिसके चलते स्कूल रिक्शा में कितने बच्चे बठाए जा सकते है यह नही बताया जा सकता है। चंद्र प्रकाश दुबे, रिक्शा लाइसेंस निर्गत प्रभारी नगर पालिका गंगाघाट उन्नाव