जिला पंचायत अध्यक्ष पद के चुनाव में संगीता सेंगर ने जीत दर्ज की। सपा प्रत्याशी ज्योति रावत व सपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की पत्नी संगीता सेंगर के बीच कांटे के मुकाबले में दोनों प्रत्याशियों को बराबर 26-26 वोट मिले। एक वोट अवैध घोषित किए जाने के बाद पर्ची डाली गई। इसमें किस्मत ने संगीता सेंगर का साथ दिया।
गुरुवार सुबह 11 बजे से वोटिंग शुरू हुई। सबसे पहला वोट जिला पंचायत सदस्य योगेश ने डाला। दोपहर एक बजे तक लगभग 33 सदस्यों ने अपने मताधिकार का प्रयोग कर लिया था। इसके बाद वोटिंग में तेजी आई और दोपहर 2 बजे तक सभी 53 सदस्यों ने वोट डाल दिया।
सभी सदस्यों के मतदान करने के बाद प्रशासन ने मतपेटी को सील कर दिया। इसके बाद एक घंटे का अवकाश हुआ। दोपहर तीनबजे से सील बक्से को खोला गया। इसके बाद गिनती शुरू हुई। दोपहर 3.15 बजे के करीब गिनती पूरी हो गई। इसमें ज्योति रावत व संगीता सेंगर को 26-26 वोट मिले।
संगीता सेंगर को मिले एक वोट में किसी वोटर ने बिंदी लगा दी थी जिस कारण उसे अवैध घोषित कर दिया गया। इसके बाद एक प्लास्टिक का डिब्बा मंगाया गया। इसमें ज्योति रावत व संगीता सेंगर के नाम की पर्ची डाली गई। डीएम सौम्या अग्रवाल ने खुद पर्ची निकाली।
जिसमें ज्योति रावत के नाम की पर्ची निकली। डिब्बे में संगीता सेंगर के नाम की पर्ची पड़ी होने से उन्हें विजेता घोषित कर दिया गया। जैसे ही समर्थकों को संगीता सेंगर की जीत की जानकारी हुई वैसे ही जशभन शुरु हो गया। समर्थकों ने जमकर नारेबाजी की।
डीएम ने संगीता सेंगर को जीत का प्रमाणपत्र दिया। जैसे ही प्रमाणपत्र लेकर संगीता बाहर निकली वैसे ही समर्थकों ने उन्हें फूलमालाओं से लाद दिया। पुलिस ने कड़ी सुरक्षा के बीच उन्हें घर पहुंचाया।
पार्टी ने किया किनारा तो सदस्यों ने दिया साथ
संगीता सेंगर को सपा हाईकमान ने जिला पंचायत अध्यक्ष पद के लिए पार्टी का उम्मीदवार घोषित नहीं किया था। सपा ने निवर्तमान अध्यक्ष ज्योति रावत को ही टिकट दी थी। इसके बाद भी उन्होंने नामांकन कराया था। सपा से अधिकृत प्रत्याशी न होने के कारण विधायक का किसी ने भी साथ नहीं दिया।
स्थिति यह रही कि जो उनके साथ हमेशा साथ रहते थे, वह भी किनारा कर गए। स्थानीय स्तर पर सपा का पूरा कुनबा पार्टी समर्थित प्रत्याशी के साथ था। पार्टी आलाकमान के घोषित प्रत्याशी के विपरीत चुनाव मैदान में उतरने वाले कुलदीप सिंह सेंगर पर जिला पंचायत सदस्यों (वोटर) ने अपना भरोसा जताया।
यही नहीं किस्मत ने भी उनका साथ दिया और लॉटरी सिस्टम के जरिए कांटे के मुकाबले में जीत दर्ज कर इतिहास रच दिया। रोमांचक मुकाबले में जीत मिलने के बाद विधायक ने इसे पार्टी (सपा) की ही जीत बताया। कहा कि यह जीत सपा की ही जीत है। क्योंकि वह खुद पार्टी से ही विधायक हैं।
हर कदम पर सफलता, हर कदम पर कामयाबी
भगवंतनगर विधायक कुलदीप सिंह सेंगर ने अपनी सियासी गणित से एकबार फिर खुद को राजनीति का धुरंधर साबित किया। खुद उनके विरोधी भी दबी जुबान ही सही, इस बात को स्वीकारते हैं। विधायक ने आज तक जितने भी चुनाव लड़े या लड़वाए सभी में जीत मिली है।
यही नहीं वह जिले के ऐसे नेता हैं जिन्होंने जिस सीट से दावेदारी की वहां सफल रहे। कुलदीप सिंह सेंगर ने सबसे पहले बसपा से सदर विधायक का चुनाव लड़ा था। यहां से उन्होंने धमाकेदार जीत दर्ज की थी। इसके बाद उन्होंने पार्टी बदली और बांगरमऊ से विधायक बने।
वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में कुलदीप ने भगवंतनगर से सपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और दिग्गजों के बीच कांटे के मुकाबले में जीत हासिंल की। इस वर्ष पंचायत चुनाव में उन्होंने पत्नी संगीता सेंगर को मियागंज सीट से जिला पंचायत सदस्य और प्रधानी में बहू (भाई अतुल सेंगर की पत्नी) को चुनावी मैदान में उतारा था।
यहां भी अपने चुनावी गणित के जरिए विरोधियों को पटखनी दी। जीत का सिलसिला नहीं रुका। गुरुवार को जिला पंचायत अध्यक्ष पद के चुनाव में भी उन्होंने कांटे के मुकाबले में पत्नी को लालबत्ती दिलाकर एक तरह से जीत की हैट्रिक बना दी।
ढह गया ज्योति का निर्विरोध ‘किला’
जिला पंचायत अध्यक्ष पद पर सपा प्रत्याशी ज्योति रावत का निर्विरोध किला गुरुवार को ढह गया। पूर्व के दो जिला पंचायत अध्यक्ष चुनावों में ज्योति निर्विरोध चुनी गई थीं।
इस बार भी सपा प्रत्याशी होने के कारण खुद के निर्विरोध होने की उम्मीद लगाई थी लेकिन पार्टी के विधायक द्वारा अपनी पत्नी को चुनावी मैदान में उतारने के बाद उनके निर्विरोध चुने जाने की संभावनाएं ध्वस्त हो गई थीं। ज्योति रावत ने 2005 में जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव सपा के टिकट पर लड़ा था।
इस चुनाव में उन्होंने नाम वापसी के अंतिम दिन ही बसपा के प्रत्याशी को अपने पक्ष में कर विरोधियों को चारों खाने चित कर निर्विरोध चुनाव जीता था। इसके बाद 2010 में बसपा ने उन्हें टिकट दिया। उन्होंने ऐसी राजनीतिक बिसात बिछाई कि बिना चुनाव लड़े ही सपा प्रत्याशी को शिकस्त दे दी थी। हालांकि बाद में सूबे में हवा का रुख भांपते हुए सपा में शामिल हो गईं।
शायद उनकी लगातार सफलता को देखते हुए ही पार्टी ने एकबार फिर उनपर भरोसा जताते हुए सपा से उम्मीदवार घोषित किया था। इस बार भी उन्हें निर्विरोध जीत दर्ज करने के साथ ही हैट्रिक लगने की उम्मीद थी पर अंतिम समय में किस्मत के साथ न देने से वह क्लीन बोल्ड हो गईं।