परियर। मान्यता है कि परियर स्थित वाल्मीकि आश्रम में खड़ा विशाल वट वृक्ष त्रेता युग में रोपा गया था। इसी आश्रम में स्थित जानकी कुंड में माता सीता समाई थीं। इस अक्षय वट को विरासत वृक्षों की सूची में भी शामिल किया गया है, लेकिन संरक्षण और देखभाल पर ध्यान नहीं दिया गया। वृक्ष की शाखाएं सूख कर गिर रही हैं।
परियर स्थित वाल्मीकि अश्रम में विशाल वट वृक्ष को चार महीने पहले संरक्षित वृक्षों की सूची में शामिल किया गया था। अब तक इसकी देखभाल पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। पिछले सप्ताह पौधरोपण अभियान के दौरान जिले के नोडल अधिकारी राजन शुक्ला ने इस आश्रम में पहुंचकर पौधे रोपे थे। इस दौरान उन्होंने वन विभाग के अधिकारियों को इस ऐतिहासिक महत्व वाले वट वृक्ष की देखरेख करने को कहा था। इसके बाद भी कोई प्रयास शुरू नहीं किए गए। मान्यता है कि यह अक्षय वट वृक्ष त्रेता युग से है। भगवान राम ने अश्वमेघ यज्ञ किया था। यज्ञ में छोड़े गए अश्व को लव और कुश ने इसी वट वृक्ष में बांधा था। वृक्ष की मूल शाखा का पता नहीं है। पूर्णिमा व अमावस्या को श्रद्धालु फाल्गुन माह की एकादशी में विशेष रूप से गंगा स्नान करने के बाद इस विशाल वट वृक्ष की पूजा अर्चना और परिक्रमा कर लोग मंगल की कामना करते हैं।
आश्रम के प्रबंधक देवशरण नंद ठठिया वाले गुरु जी ने बताया कि यह पौराणिक स्थल हमेशा उपेक्षा का शिकार रहा है। आश्रम का प्राचीन वट वृक्ष विरासत वृक्षों की सूची में शामिल किया गया था। उम्मीद थी कि इस वृक्ष का संरक्षण किया जाएगा, लेकिन अब तक ऐसा नहीं हुआ। डीएफओ ईशा तिवारी ने बताया कि वृक्ष के संरक्षण के लिए जो भी आवश्यक होगा जल्द ही कदम उठाए जाएंगे।