नवाबगंज। जिले में स्वास्थ्य सेवाओं की हालत जानने आई एनआरएचएम टीम को दूसरे दिन भी ऐसी तस्वीरें देखने को मिली जिन्होेंने जनपद की बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं की हकीकत सामने रख दी।
गुरुवार को नवाबगंज सीएचसी पहुंची टीम को निरीक्षण के दौरान मरीजों ने बताया कि चिकित्सक इलाज को सरकारी अस्पताल में कर रहे हैं लेकिन दवा बाहर से लाने के लिए कहते हैं। पर्चा थमाकर रोजाना सीएचसी के बाहर स्थित मेडिकल स्टोर से दवा मंगवाने को मजबूर है।
निरीक्षण के दौरान लेबर रूम में गंदगी फैली मिली। इसके अलावा आकस्मिक चिकित्सा कक्ष में औजार रखने वाली इमरजेंसी ट्रे नहीं मिली। इस पर टीम प्रभारी डॉ. रचना ने सीएचसी प्रभारी को फटकार लगाई और सुधार करने के निर्देश दिए।
एनआरएचएम की क्वालिटी एसोरेंस इकाई की उप महाप्रबंधक डॉ. रचना सुबह 10 बजे अपने साथी डॉ. सौरभ के साथ सीएचसी पहुंची। सीएचसी के अंदर घुसते ही गंदगी देख डॉ. रचना का पारा हाई हो गया। उन्होंने स्वास्थ्य केंद्र प्रभारी डॉ. नारेंद्र सिंह को फटकार लगाई।
उसके बाद उन्होंने दवा वितरण कक्ष देखा। प्रसव कक्ष के बाहर रखे ऑक्सीजन सिलेंडर में कवर न देख केंद्र प्रभारी को सिलेंडर व पाइप को ढकने के निर्देश दिए। आकस्मिक चिकित्साकक्ष में इमरजेंसी ट्रे (जिस पर प्रसव संबंधी औजार रखे जाते हैं) न मिलने पर स्वास्थ्य केंद्र प्रभारी से पूछा कि इसी तरह इलाज कर रहे हो क्या? उप महाप्रबंधक की मौजूदगी में ही इमरजेंसी ट्रे उपलब्ध हो गई।
डॉ. रचना ने स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती मरीजों से बातचीत की और उनकी देखभाल के बारे में पूछा। इस पर मरीजों को अपनी व्यथा टीम के सामने सुनानी शुरू कर दी। कई मरीजों ने डाक्टरों द्वारा बाहर से दवा लिखे जाने की शिकायत की। बताया कि सर्द रातों में ओढ़ने के लिए उन लोगों को सिर्फ कंबल मिलता है, जबकि पांच-छह डिग्री सेल्सियस में इस कंबल से उनकी ठंड तक दूर नहीं होती है।
मजबूरी में घर से रजाई मंगाकर किसी तरह सर्दी दूर कर रहे हैं। लगभग डेढ़ घंटे तक स्वास्थ्य केंद्र में रुकने के बाद वह चमरौली स्थिति स्वास्थ्य उपकेंद्र पहुंचीं। मरीजों की बात सुनकर टीम के सदस्य ने सीएचसी प्रभारी की ओर देखा और आगे बढ़ गए।
इनसेट...
जांच तो कई बार हुई पर सुधरा कुछ नहीं
नवाबगंज। एनआरएचएम टीम ऐसा नहीं है कि पहली बार जनपद में स्वास्थ्य सेवाओं की हालत जानने पहुंची हो। इससे पहले भी वह कई बार यहां आकर जांच कर चुकी है और अपनी जांच रिपोर्ट स्वास्थ्य निदेशक को सौंप चुकी हैं। लेकिन हकीकत यह है कि टीम की जांच रिपोर्ट के बाद भी होता कुछ नहीं है। डॉक्टर अपनी ड्यूटी न तो ईमानदारी से कर रहे हैं और न ही मरीजों को सरकारी सुविधाओं का लाभ ही लेने दे रहे हैं। सरकारी नौकरी से ज्यादा चिकित्सक निजी क्लीनिकों पर ध्यान दे रहे हैं।