अति कुपोषित बच्चों के इलाज के लिए जिला अस्पताल में पोषण पुनर्वास केंद्र के नाम से दस बेड का अलग वार्ड बनाया गया है। इस वार्ड में सिर्फ अति कुपोषित बच्चों का ही इलाज किया जाता है। बच्चों का समुचित इलाज हो इसके लिए अलग से स्टाफ की भी तैनाती है। लगातार अति कुपोषित बच्चों की संख्या में इजाफा हो रहा है। पिछले तीन साल के आंकड़ों पर गौर किया जाए तो संख्या बढ़ी है। जिला अस्पताल के एनआरसी (पोषण पुनर्वास केंद्र ) के आंकड़ों पर गौर किया जाए तो 2013 में कुल 150 अति कुपोषित बच्चों को इलाज के लिए भर्ती कराया गया। वर्ष 2014 में संख्या बढ़कर 368 पहुंच गई और 2015 में 506 अति कुपोषित बच्चे एनआरसी में भर्ती कराए गए। कुपोषित बच्चों की बढ़ती संख्या को देखते हुए सरकार ने बच्चों के साथ केंद्र में रुकने वाले परिजनों को भी पौष्टिक आहार देने की व्यवस्था की। साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में आशा व आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों को सक्रिय रहकर आसपास गांवों में कुपोषित बच्चों का चिन्हांकन कर उन्हें कुपोषण पुनर्वास केंद्र में भर्ती कराने के निर्देश दिए गए हैं।
पिचके गाल तो समझो कुपोषित ‘लाल’
अति कुपोषित बच्चों की पहचान उनकी लंबाइ व वजन से की जाती है। अति कुपोषित बच्चों के गाल पिचके हुए। उम्र के अनुपात में लंबाई कम बढ़ना। हाथ पैरों में सूजन, आहार कम लेना, वजन न बढ़ना। यह सभी कुपोषण के लक्षण होते हैं और इनमें से कोई भी लक्षण नजर आने पर तत्काल अच्छे डॉक्टर को दिखाएं और जरूरी इलाज कराएं।
क्या बोले सीएमएस
एनआरसी में अति कुपोषित बच्चों को ही भर्ती किया जाता है। कुपोषित बच्चों के लिए आंगनबाड़ी केंद्रों पर व्यवस्थाएं हैं। आंगनबाड़ी केंद्रों में कुपोषित बच्चों के पेट में कीड़ा मारने की दवा, ताकत देने के लिए पंजीरी व अन्य व्यवस्थाएं होती हैं। देखभाल के लिए आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों व आशा को लगाया गया है। वह कुपोषित बच्चों को सीएचसी, पीएचसी में भर्ती कराती हैं। यहां जो बच्चा अति कुपोषित होता है उसे एनआरसी में भर्ती कराया जाता है। डॉ. एसपी चौधरी, सीएमएस उन्नाव