बताते चलें आपातकालीन स्थिति में इलाज के अभाव में हो रही मौतों को रोकने के लिए 2014 में जिले में 120.83 लाख रुपये की लागत से ट्रामासेंटर के निर्माण की मंजूरी मिली थी। कभी बजट कम तो कभी लेबर कम होने के बीच जैसे-तैसे ट्रामासेंटर का निर्माण अब जाकर पूरा हो पाया। यहां स्वीकृत नौ डाक्टर और इतनी ही स्टाफ नर्स के सापेक्ष सात डॉक्टरों की तैनाती कर दी गई है। ट्रामासेंटर में निश्चेतक (बेहोशी) पद पर डा. तेजवीर सिंह हैं। डा. विकास सचान, डा. विशाल सेठिया और डा. दिनेश प्रताप सरोज आर्थोपेडिक सर्जन हैं। इसके अलावा ईएमओ पद पर डा. प्रजेश कुमार श्रीवास्तव, डा. शैलेश कुमार त्रिपाठी व डा. प्रशांत उपाध्याय हैं। प्रदेश सरकार के संयुक्त सचिव विनोद कुमार सिंह ने चिकित्साधिकारियों को तत्काल नए तैनाती स्थल पर कार्यभार ग्रहण करने के निर्देश दिए हैं। हैरानी की बात यह है कि ट्रामासेंटर में सात डॉक्टरों की तो तैनाती कर दी गई, लेकिन एक्सरे, ईसीजी मशीन, ओटी समेत अन्य जरूरी उपकरण नहीं हैं। ऐसे में ट्रामासेंटर में डॉक्टरों की तैनाती का लोगों को कोई लाभ नहीं।
न न्यूरोसर्जन की पोस्ट और न ही सिटीस्केन की है व्यवस्था
इस ट्रामासेंटर में न्यूरो सर्जन की पोस्ट ही नहीं है और न ही सिटीस्केन की व्यवस्था है। जिले व आसपास के इलाकों में हादसों में होने वाली मौतों में ज्यादातर सिर पर गहरी चोट लगने से होती है। लिहाजा इलाज शुरू करने से पहले बुनियादी स्तर पर जरूरी जांचों के न होने से ट्रामासेंटर केवल सरकारी ड्रामा ही साबित होगा। हर महीने औसतन दस मौतें सड़क हादसों में होतीं है। जिला अस्पताल में इलाज की व्यवस्था न होने से घायलों को कानपुर या लखनऊ में इलाज के लिए भेजा जाता है। समय पर इलाज न मिलने से तमाम लोगों की मौत हो जाती है। जिले में ट्रामासेंटर बनने के बाद भी यहां न्यूरो सर्जन और सीटी स्केन की व्यवस्था न होने से लोगों को बहुत काम नहीं आएगा।
ट्रामासेंटर के लिए सात डाक्टरों की तैनाती की गई है। उपकरण न होने से फिलहाल जिला अस्पताल में इन डाक्टरों की सेवाएं ली जाएंगी। सेंटर के सभी जरूरी उपकरण मांगने की प्रक्रिया शुरू है। शासन से पत्राचार किया जा रहा है। डा. एसपी चौधरी, सीएमएस जिला अस्पताल।